भारतीय रिजर्व बैंक ने गुरुवार को टाटा संस को लेकर बड़ा फैसला लिया है। केंद्रीय बैंक ने कंपनी का नाम एक बार फिर अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (एनबीएफसी) की सूची में रखा है। हालांकि, आरबीआई ने यह भी साफ कर दिया कि इस फैसले का टाटा संस की एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन सरेंडर (डी-रजिस्ट्रेशन) करने की लंबित अर्जी पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उस आवेदन पर अलग से फैसला लिया जाएगा।
RBI ने स्केल-बेस्ड रेगुलेशन के तहत 17 अपर-लेयर एनबीएफसी की नई सूची जारी की है। इस सूची में उन कंपनियों को शामिल किया जाता है, जिनका देश की वित्तीय व्यवस्था पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है। ऐसी कंपनियों पर आरबीआई की कड़ी निगरानी रहती है। उन्हें सामान्य एनबीएफसी की तुलना में ज्यादा सख्त नियमों का पालन करना पड़ता है।
आरबीआई ने क्या-क्या कहा?
आरबीआई ने अपने बयान में कहा कि टाटा संस का अपर-लेयर सूची में बने रहना केवल नियामकीय प्रक्रिया का हिस्सा है। इसका कंपनी की डी-रजिस्ट्रेशन अर्जी पर कोई असर नहीं पड़ेगा। केंद्रीय बैंक ने बताया कि आवेदन अभी विचाराधीन है और इस पर बाद में फैसला लिया जाएगा। फिलहाल इसके लिए कोई समयसीमा तय नहीं की गई है।
टाटा संस के लिए इसका क्या मतलब है?
टाटा संस को पहली बार वर्ष 2022 में अपर-लेयर एनबीएफसी के रूप में वर्गीकृत किया गया था। इसके बाद कंपनी पर कई अतिरिक्त नियम लागू हो गए थे। इनमें बेहतर कॉरपोरेट गवर्नेंस, अधिक पूंजी रखने, ज्यादा खुलासे करने और कुछ मामलों में शेयर बाजार में लिस्टिंग जैसी शर्तें शामिल थीं।
इन नियमों से राहत पाने के लिए टाटा संस ने पिछले कुछ वर्षों में अपने वित्तीय कारोबार में कई बदलाव किए। कंपनी ने कर्ज कम किया, समूह के वित्तीय ढांचे का पुनर्गठन किया और आरबीआई से एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की अनुमति भी मांगी। लेकिन अभी तक इस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
क्या करती है टाटा संस?
टाटा संस एक कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी है। यानी इसका मुख्य काम आम एनबीएफसी की तरह लोगों या कंपनियों को कर्ज देना नहीं है। यह टाटा समूह की कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी रखती है और वहीं से मिलने वाले डिविडेंड तथा निवेश से कमाई करती है। कंपनी की आय का बड़ा हिस्सा टीसीएस, टाटा मोटर्स, टाइटन, इंडियन होटल्स जैसी समूह की बड़ी कंपनियों से मिलने वाले डिविडेंड से आता है।
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अपर-लेयर NBFC क्या होती है?
आरबीआई, एनबीएफसी को जोखिम और आकार के आधार पर चार श्रेणियों में बांटता है:-
- बेस लेयर
- मिडिल लेयर
- अपर लेयर
- टॉप लेयर
अपर-लेयर में उन्हीं कंपनियों को रखा जाता है, जिनका वित्तीय प्रणाली पर बड़ा असर पड़ सकता है। इसलिए इन पर पूंजी, जोखिम प्रबंधन, गवर्नेंस और निगरानी से जुड़े कड़े नियम लागू होते हैं।
इस सूची में और कौन-कौन सी कंपनियां हैं?
आरबीआई की नई अपर-लेयर सूची में कई बड़ी वित्तीय कंपनियां शामिल हैं। इनमें आरईसी, पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन, इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉर्पोरेशन, एचयूडीसीओ, बजाज फाइनेंस, श्रीराम फाइनेंस, एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, बजाज हाउसिंग फाइनेंस, टाटा कैपिटल, चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट, मुथूट फाइनेंस, आदित्य बिड़ला कैपिटल, एलएंडटी फाइनेंस, एचडीबी फाइनेंशियल सर्विसेज और पिरामल फाइनेंस जैसी कंपनियां शामिल हैं।
पांच साल वाला नियम क्या है?
आरबीआई के नियमों के अनुसार, यदि कोई कंपनी एक बार अपर-लेयर एनबीएफसी में शामिल हो जाती है, तो उसे कम से कम पांच साल तक इन सख्त नियमों का पालन करना होता है। भले ही बाद में उसका आकार या जोखिम का स्तर बदल जाए। इसी वजह से पीएनबी हाउसिंग फाइनेंस और सम्मान कैपिटल भी इस बार सूची में बने हुए हैं।