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RBI: 2000 का नोट बदलने की कवायद 'नोटबंदी' नहीं; RBI ने दिल्ली हाईकोर्ट में रखा अपना पक्ष, फैसला सुरक्षित

Tue, 23 May 2023 02:35 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

RBI: मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने कहा कि वह वकील की जनहित याचिका पर उचित आदेश पारित करेगी। अदालत ने कहा, "हम इस पर गौर करेंगे। हम उचित आदेश पारित करेंगे।" 
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Delhi High Court - फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
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भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने मंगलवार को दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया कि 2000 रुपये के नोटों को वापस लेना नोटबंदी नहीं है, बल्कि एक वैधानिक कवायद है। आरबीआई ने कहा कि दो हजार के नोट परिचालन सुविधा के लिए शुरू किए गए थे। अदालत वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें कहा गया है कि आरबीआई और एसबीआई की ओर से बिना सबूत के 2000 रुपये के बैंक नोटों को बदलने की अधिसूचना मनमानी है और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए बनाए गए कानूनों के खिलाफ है। 

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मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने कहा कि वह वकील की जनहित याचिका पर उचित आदेश पारित करेगी।  अदालत ने कहा, "हम इस पर गौर करेंगे। हम उचित आदेश पारित करेंगे।" उपाध्याय ने स्पष्ट किया कि वह 2000 रुपये के बैंक नोट को वापस लेने के फैसले को चुनौती नहीं दे रहे थे, लेकिन बिना किसी पर्ची या पहचान पत्र के नोट बदलने पर रोक लगवाना उनका मकसद था।

उन्होंने जोर देकर कहा कि 2000 रुपये के बैंक नोट को बैंक खाते में जमा के माध्यम से बदलने की अनुमति दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि नोट बदलने के लिए आईडी प्रूफ क्यों नहीं मांगा जा रहा है? हर गरीब का जनधन खाता है। बीपीएल व्यक्ति भी बैंक खातों से जुड़े हुए हैं।' उपाध्याय ने दावा किया कि मौजूदा व्यवस्था से केवल 'अतीक अहमद के गुर्गे' जैसे माफिया, गैंगस्टर और नक्सली ही फायदा लेंगे।
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आरबीआई की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पराग पी त्रिपाठी ने इस बात पर जोर दिया कि अदालत ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है और परिचालन सुविधा के लिए 2000 रुपये के नोट को बदलने की अनुमति देने का निर्णय लिया गया है।

उन्होंने कहा, "यह नोटबंदी नहीं है। 2000 रुपये के बैंक नोट का आमतौर पर उपयोग नहीं किया जाता था। अन्य मूल्यवर्ग के नोट पर्याप्त मात्रा में परिचालन में मौजूद हैं।"
उन्होंने कहा, "यह एक वैधानिक कवायद है। याचिकाकर्ता की ओर से किए गए दावों में से कोई भी संवैधानिक मुद्दों के उल्लंघन से संबंधित नहीं है।" अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है।

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