भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने मंगलवार को देश के बैंकिंग सिस्टम में 48,014 करोड़ रुपये की शाॅर्ट टर्म लिक्विडिटी यानी अल्पकालिक तरलता डाली है। केंद्रीय बैंक ने सात दिवसीय 'वेरिएबल रेट रेपो' (वीआरआर) नीलामी के जरिए बैंकिंग प्रणाली के लिए इस राशि का इंतजाम किया है। हाल ही में एडवांस टैक्स (अग्रिम कर) के भारी भुगतान के कारण बैंकिंग प्रणाली में नकदी के अधिशेष (सरप्लस लिक्विडिटी) में तेज गिरावट दर्ज की गई थी, जिसके बाद अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह संतुलित करने के लिए यह कदम उठाया गया है।
बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी की स्थिति में पिछले कुछ दिनों के भीतर बड़ा बदलाव देखने को मिला है। कॉरपोरेट्स द्वारा एडवांस टैक्स के भुगतान के कारण बैंकों से बड़े पैमाने पर फंड का आउटफ्लो हुआ है। एडवांस टैक्स के भुगतान से पहले, 15 मार्च को बैंकिंग प्रणाली में लगभग 2.08 लाख करोड़ रुपये की भारी अतिरिक्त लिक्विडिटी मौजूद थी। टैक्स आउटफ्लो के ठीक बाद, 16 मार्च को यह अधिशेष तेजी से गिरकर मात्र 75,483.63 करोड़ रुपये पर आ गया। इससे निपटने के लिए अल्पकालिक तरलता का प्रबंध किया गया है।
वीआरआर (वेरिएबल रेट रेपो) नीलामी के तहत, भारतीय रिजर्व बैंक छोटी अवधि के लिए परिवर्तनशील ब्याज दरों पर फंड की नीलामी करता है। इस प्रक्रिया में वाणिज्यिक बैंकों को अपनी आवश्यकता के अनुसार एक निश्चित राशि के लिए बोली लगाने (विडिंग) की अनुमति होती है, जिससे वे अपनी तात्कालिक नकदी की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं।
बाजार के जानकारों और मौजूदा रुझानों के अनुसार, बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी की स्थिति आने वाले दिनों में और अधिक टाइट (तंग) होने की उम्मीद है। इसका मुख्य कारण इस सप्ताह के अंत में होने वाला वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का भुगतान है। जीएसटी आउटफ्लो के कारण बैंकों से और अधिक फंड बाहर जाएगा, जिससे नकदी का दबाव बढ़ सकता है।
केंद्रीय बैंक पिछले कुछ महीनों से लगातार बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी डाल रहा है ताकि ओवरनाइट दरों को नियंत्रण में रखा जा सके। लिक्विडिटी के इस निरंतर प्रवाह के कारण ही ओवरनाइट दरें रेपो रेट से काफी नीचे बनी हुई हैं।