वैश्विक बाजार में कच्चे माल की कीमतों में अनिश्चितता और किसानों को महंगाई से बचाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने रबी सीजन 2025-26 के लिए उर्वरक सब्सिडी में बढ़ोतरी की है। सरकार ने इस सीजन के लिए 37,952 करोड़ रुपये की अनुमानित उर्वरक आवश्यकता तय की है, जो खरीफ 2025 सीजन के मुकाबले करीब 736 करोड़ रुपये अधिक है। यह कदम न केवल बुवाई के आगामी सीजन में उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करेगा, बल्कि मृदा स्वास्थ्य को संतुलित बनाए रखने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण नीतिगत पहल है।
सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उर्वरकों और कच्चे माल की अस्थिर कीमतों को देखते हुए की गई है। किसानों पर लागत का बोझ न पड़े, इसके लिए सरकार ने पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (एनबीएस) योजना के तहत सब्सिडी दरों में, विशेषकर डाय-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) के लिए, भारी वृद्धि की है। डीएपी पर सब्सिडी पिछले वर्ष के 21,911 रुपये प्रति टन से बढ़ाकर 29,805 रुपये प्रति टन कर दी गई है। इस निर्णय का सीधा लाभ गेहूं, तिलहन और दालों की खेती करने वाले किसानों को मिलेगा, क्योंकि रबी सीजन इन फसलों की बुवाई का मुख्य समय होता है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पीक सीजन के दौरान किसानों को किफायती दरों पर उर्वरक उपलब्ध होते रहें।
पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) योजना, जिसे भारत सरकार ने 1 अप्रैल 2010 से लागू किया था, उर्वरक क्षेत्र में एक बड़ा नीतिगत बदलाव मानी जाती है। पुरानी व्यवस्था के विपरीत, जो यूरिया के अत्यधिक उपयोग को प्रोत्साहित करती थी, एनबीएस ढांचा उर्वरकों में मौजूद पोषक तत्वों- नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), पोटाश (K) और सल्फर (S)- के आधार पर सब्सिडी तय करता है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, एनबीएस योजना के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। देश में खाद्यान्न उत्पादकता, जो 2010-11 में 1,930 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी, वह 2024-25 में बढ़कर 2,578 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई है। यह वृद्धि मोटे तौर पर एनबीएस योजना के विस्तार की अवधि के साथ मेल खाती है। घरेलू उत्पादन के मोर्चे पर भी भारत ने महत्वपूर्ण प्रगति की है। 2014 के बाद से घरेलू फॉस्फेटिक और पोटाश (P&K) उर्वरक उत्पादन में 50% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे आयात पर निर्भरता कम हुई है।
आंकड़ों पर गौर करें तो केंद्र सरकार ने 2022-23 और 2024-25 के बीच NBS सब्सिडी पर 2.04 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं। हालांकि, कुछ आलोचक इतनी भारी सब्सिडी के राजकोषीय स्थायित्व (Fiscal Sustainability) पर सवाल उठाते हैं, लेकिन समर्थकों का तर्क है कि उच्च पैदावार, बेहतर मृदा स्वास्थ्य और आयात पर कम होती निर्भरता इस खर्च को उचित ठहराती है। रबी सीजन के लिए बढ़ी हुई सब्सिडी न केवल किसानों को वैश्विक महंगाई से राहत देगी, बल्कि यह भारतीय कृषि को वैज्ञानिक और संतुलित खेती की ओर ले जाने की सरकार की दीर्घकालिक रणनीति का भी हिस्सा है।