चुनाव आयोग ने भले ही राजनीतिक दलों के लिए चुनावी खर्च की सीमा तय कर रखी हो, लेकिन पार्टियां मतदाताओं को लुभाने के लिए खुले हाथों से खर्च करने में पीछे नहीं रहतीं। यहां तक कि अपनी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए करोड़ों रुपये बहाती हैं। निर्वाचन आयोग को दी अपनी ऑडिट रिपोर्ट में राजनीतिक दलों ने खुद यह बात मानी है। वर्ष 2015 से 2020 तक हुए विभिन्न चुनावों में राजनीतिक दलों ने 6,500 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। इनमें 11 दल क्षेत्रीय जबकि सात राष्ट्रीय हैं।
ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, सात राष्ट्रीय पार्टियों में भाजपा, कांग्रेस, बसपा, एनसीपी, सीपीआई, तृणमूल कांग्रेस व अन्य हैं। उपरोक्त रकम में से करीब 3,400 करोड़ यानी 54 फीसदी रकम पार्टियों ने विज्ञापनों पर खर्च की है। हालांकि, इसमें स्थानीय स्तर के भी खर्च शामिल हैं। इस दौरान, पांच वर्षों में भाजपा ने सबसे अधिक 56 फीसदी यानी 3,600 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। वहीं, कांग्रेस ने 21.41 फीसदी (1,400 करोड़) रकम खर्च की। इसका मतलब कुल 18 पार्टियों में से इन दोनों ने अकेले 77 फीसदी से ज्यादा पैसा खर्च किया है। सपा ने 3.95 फीसदी, डीएमके ने 3.6 फीसदी, वाईएसआर कांग्रेस ने 2.17 फीसदी, बसपा ने 2.04 और तृणमूल कांग्रेस ने 1.83 फीसदी रकम खर्च की है।
2019-20 में 18 पार्टियों ने कुल बजट का 49 फीसदी हिस्सा यानी 2,800 करोड़ रुपये विज्ञापन व प्रचार पर खर्च किए हैं। 1,300 करोड़ प्रचार पर खर्च हुए। सबसे अधिक 58% यानी 700 करोड़ भाजपा ने अकेले खर्च किए। वहीं, कांग्रेस ने 29.5%, एनसीपी ने 3.6% और आम आदमी पार्टी ने 1.7% रकम खर्च की।
उम्मीदवारों पर भी जमकर खर्च
वास्तविक खर्च का अनुमान मुश्किल
हर चुनाव में प्रत्याशियों के खर्च की सीमा तय है। बावजूद इसके किसी प्रत्याशी ने कितना खर्च किया, इसका वास्तविक अनुमान लगाना मुश्किल है।
चुनावों में प्रमुख खर्च
सबसे महंगा चुनाव इस बार एक लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च की उम्मीद
3,400 करोड़ यानी 54 फीसदी रकम सिर्फ विज्ञापनों पर खर्च
भाजपा
कांग्रेस