EAC-PM के सदस्य संजीव सान्याल ने 'रेवड़ी कल्चर' और पुरानी पेंशन स्कीम को भविष्य के लिए 'वित्तीय खतरा' बताया है। जानें क्यों उन्होंने इसे अगली पीढ़ी पर कर्ज का बोझ कहा और फ्रांस का उदाहरण दिया।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य और वरिष्ठ अर्थशास्त्री संजीव सान्याल ने देश की आर्थिक नीतियों, विशेषकर 'मुफ्त की रेवड़ी' कल्चर और पुरानी पेंशन योजनाओं की वापसी को लेकर एक गंभीर चेतावनी जारी की है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि बिना सोचे-समझे बांटी जा रही सब्सिडी और पेंशन के भारी-भरकम वादे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा वित्तीय बोझ तैयार कर रहे हैं, जो भविष्य की अर्थव्यवस्था को खतरे में डाल सकता है। एएनआई को दिए एक विशेष साक्षात्कार में सान्याल ने 'कल्याणकारी सुरक्षा कवच' और 'राजनीति से प्रेरित रेवड़ी' के बीच की बारीक लकीर के बारे में बताया।
संजीव सान्याल ने कहा कि भारत जैसे उद्यमी और जोखिम लेने वाले समाज में विफलता की संभावना हमेशा बनी रहती है। चाहे वह कोई स्टार्टअप हो या एक छोटी किराना दुकान, रिस्क हर स्तर पर है। ऐसे में, जो लोग विकास की दौड़ में पीछे छूट जाते हैं या असफल होते हैं, उनके लिए सरकार को एक सुरक्षा कवच देना जरूरी है। उन्होंने कहा, "मैं इस पक्ष में हूं कि गरीब तबके को ऊपर उठने के लिए सीढ़ी दी जाए। मुझे इससे कोई समस्या नहीं है।" सान्याल ने इसे 'असिस्टेड ट्रिकल-डाउन' का नाम दिया, यानी केवल आर्थिक विकास का इंतजार करने के बजाय, लोगों को ऊपर चढ़ने में मदद करना।
सान्याल का तर्क है कि जब कामकाजी लोग कम होंगे और पेंशन पाने वाले बुजुर्ग ज्यादा, तो उस छोटी होती युवा आबादी पर पिछली पीढ़ी की पेंशन का आर्थिक भार डालना असंभव हो जाएगा। इस खतरे को समझाने के लिए उन्होंने यूरोप, विशेषकर फ्रांस का उदाहरण दिया। सान्याल ने कहा, "कई यूरोपीय देशों में रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाकर 70 या 75 साल की जा रही है। फ्रांस में आज काम करने वालों से ज्यादा तादाद पेंशन पाने वालों की हो गई है।" उनका कहना है कि यदि भारत ने आज अपनी राजकोषीय हकीकत को नजरअंदाज किया, तो हम भी उसी दिशा में बढ़ सकते हैं।