पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के बीच भारत के लिए राहत की खबर सामने आ रही है। शिप ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, दो भारतीय ध्वज वाले एलपीजी टैंकर पाइन गैस और जग वसंत ने होर्मुज को सुरक्षित पार कर लिया है। सोमवार दोपहर ये दोनों जहाज ईरान के लारक और केश्म द्वीपों के बीच देखे गए, जहां वे संभवतः ईरानी अधिकारियों को अपनी पहचान स्पष्ट कर रहे थे।
मंत्रालय के अनुसार, भारतीय ध्वज वाले दो एलपीजी वाहक पोत, जग वसंत और पाइन गैस, जिनमें 92,612.59 मीट्रिक टन एलपीजी भरी हुई थी, आज शाम होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरे। इन पोतों पर क्रमशः 33 और 27 भारतीय नाविक सवार थे। ये पोत भारत के लिए रवाना हुए हैं और इनके 26 से 28 मार्च 2026 के बीच बंदरगाहों पर पहुंचने की संभावना है।
इससे पहले भी भारत के कुछ जहाज सुरक्षित बाहर निकल चुके हैं। एलपीजी टैंकर एमटी शिवालिक 16 मार्च को गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह पहुंचा, जबकि एमटी नंदा देवी 17 मार्च को कांडला बंदरगाह पहुंची। दोनों जहाज करीब 92,712 टन एलपीजी लेकर आए थे, जो देश की लगभग एक दिन की घरेलू गैस खपत के बराबर है।
इसी क्रम में जग लाडकी नामक भारतीय तेल टैंकर, जो यूएई से 80,886 टन कच्चा तेल लेकर आ रहा था, 18 मार्च को मुंद्रा पहुंच गया। वहीं जग प्रकाश नामक टैंकर ओमान से पेट्रोल लेकर अफ्रीका के लिए सुरक्षित रूप से हॉर्मुज पार कर चुका है और तंजानिया की ओर बढ़ रहा है।
युद्ध की शुरुआत में कुल 28 भारतीय जहाज इस क्षेत्र में मौजूद थे, जिनमें 24 जलडमरूमध्य के पश्चिमी हिस्से और चार पूर्वी हिस्से में थे। बीते दिनों दोनों ओर से दो-दो जहाज सुरक्षित निकल चुके हैं, लेकिन अभी भी 24 में से 22 जहाज पश्चिमी हिस्से में फंसे हुए हैं, जिन पर 611 नाविक सवार हैं, जबकि दो जहाज पूर्वी हिस्से में हैं।
भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य बेहद अहम है। देश अपनी जरूरत का करीब 88 फीसदी कच्चा तेल, 50 फीसदी प्राकृतिक गैस और 60 फीसदी एलपीजी आयात करता है। युद्ध से पहले भारत के आधे से ज्यादा कच्चे तेल का आयात सऊदी अरब, इराक और यूएई जैसे खाड़ी देशों से होता था, जो इसी मार्ग पर निर्भर हैं।
हालांकि कच्चे तेल की आपूर्ति को रूस, अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे वैकल्पिक स्रोतों से कुछ हद तक संतुलित किया गया है, लेकिन गैस और एलपीजी की सप्लाई प्रभावित हुई है। इसका असर औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं पर साफ दिख रहा है।