कच्चे तेल की कीमतें 11 माह के अधिकतम स्तर 50 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गईं हैं। इस बीच सरकार ने कहा है कि राजकोषीय गणित और महंगाई का समीकरण प्रभावित नहीं होगा अगर कच्चे तेल की कीमतें 60 डॉलर से नीचे रहें।
केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने कहा कि अगर तेल कीमतें 40-60 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहतीं हैं तो भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति ठीक रहेगी लेकिन अगर यह इससे ऊपर जाती है तो यह चिंता का कारण हो सकतीं हैं। तेल कीमतों में गिरावट उन कारकों में से एक है जिन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के ऊपर उठने में मदद की है। इससे आयात बिल में कमी आई है और महंगाई पर अंकुश लगाने में मदद मिली है। भारत को कच्चे तेल की कीमतों में प्रति बैरल 1 डॉलर इजाफा होने पर सालाना 9,126 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे।
इसके अलावा कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से महंगाई और ग्रोथ पर भी असर पड़ता है। भारत ने 2015-16 में कच्चे तेल के आयात पर 63.96 अरब डॉलर खर्च किया था। यह पिछले वित्त वर्ष में तेल आयात पर खर्च किए गए 112.7 अरब डॉलर का लगभग आधा है। वित्त वर्ष 2013-14 में तेल आयात बिल 143 अरब डॉलर था।
मौजूदा वित्त वर्ष के लिए आयात बिल 48 डॉलर प्रति बैरल कीमत के साथ आयात बिल 66 अरब डॉलर रहने का अनुमान है। पिछले सप्ताह वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी कहा था कि भारत तेल कीमतों की मौजूदा रेंज को संभाल सकता है लेकिन ऊंची तेल कीमतें अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने के साथ महंगाई का दबाव भी बढ़ा सकती हैं।