बेनामी संपत्ति रोधी कानून के लिए बने निर्णायक प्राधिकरण ने लखनऊ से जुड़े एक मामले में आयकर विभाग की ओर से 2023 में जारी भूमि संपत्ति कुर्की आदेश को बरकरार रखा है। मामले में कर अधिकारी बेनामी संपत्ति के "लाभार्थी मालिक" की पहचान नहीं कर पाए थे। प्राधिकरण ने कहा कि उक्त कानून में ऐसे मामलों से निपटने के लिए विशिष्ट प्रावधान हैं।
विभाग की लखनऊ स्थित बेनामी निषेध इकाई (बीपीयू) ने अक्तूबर 2023 में एक अनंतिम आदेश जारी कर काकोरी में 3.47 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की पांच जमीनों को कुर्क किया था और उन्हें "बेनामी संपत्ति" करार दिया गया था। यह आदेश प्राधिकरण को पुष्टि के लिए भेजा गया था, जिसमें एक 'बेनामीदार' (जिसके नाम पर बेनामी संपत्ति है) के अलावा दो कंपनियों और दो व्यक्तियों का नाम भी शामिल था। इन लोगों को मामले में 'हितधारक' के रूप में नामित किया गया था। आदेश में किसी लाभ हासिल करने वाले किसी मालिक के नाम का जिक्र नहीं किया गया था।
आमतौर पर, जब आयकर विभाग बेनामी संपत्ति लेनदेन निषेध (पीबीपीटी) अधिनियम, 1988 के तहत संपत्ति कुर्की का आदेश जारी करता है, तो उस पर 'बेनामीदार' और 'लाभ हासिल करने वाले मालिक' का नाम अंकित होता है। 'बेनामी' का मतलब है 'बिना नाम वाली' संपत्ति। ऐसी संपत्ति का असली लाभार्थी वह नहीं होता जिसके नाम पर इसे खरीदा गया हो।
न्यायालय ने आयकर कुर्की आदेश से दो कंपनियों- पिंटेल रियल एस्टेट एलएलपी और एक्सेला प्रीमियोइन्फ्रा एलएलपी- के अलावा एक व्यक्ति शिव कुमार का नाम हटाने का आदेश दिया और कहा कि उनके खिलाफ "कोई स्पष्ट सबूत" नहीं है। प्राधिकरण के आदेश में हरेश कुमार मिश्रा को भी इस मामले में "सहयोगी" के रूप में नामित किया गया है तथा कर अधिकारी को कुछ और संपत्तियों के खिलाफ "जांच करने" का निर्देश दिया गया है, जिनके बारे में बताया गया है कि उन्हें रवि कुमार के नाम पर खरीदा गया था।
कर विभाग की लखनऊ बीपीयू ने हाल ही में प्राधिकरण के निर्देश पर शहर के मोहनलालगंज क्षेत्र में स्थित 5.68 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की पांच जमीनें कुर्क की हैं। मामले में प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि कुर्की आदेश को रद्द कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि आदेश में किसी "लाभ हासिल करने वाले मालिक" की पहचान नहीं की गई थी, जबकि उक्त कानून के तहत ऐसा करना आवश्यक है।
प्राधिकरण ने कहा, "यदि अधिकारियों की ओर से पीबीपीटी अधिनियम की धारा 2(9)(डी) के प्रावधानों को लागू किया जाता तो अस्पष्टता उत्पन्न नहीं होती। किसी संपत्ति के संबंध में लेनदेन या व्यवस्था के लिए विशिष्ट प्रावधान है, जहां प्रतिफल (धन) प्रदान करने वाले व्यक्ति का पता नहीं चल पाता है।" न्यायालय ने कहा कि उक्त कुर्की आदेश को केवल इस आधार पर "अवैध" घोषित नहीं किया जा सकता कि जांच अधिकारी ने धारा 2(9)(डी) के स्थान पर पीबीपीटी अधिनियम की धारा 2(9)(ए) का प्रयोग किया था।
प्राधिकरण ने सर्वोच्च न्यायालय के 2009 के एक आदेश का हवाला दिया। जिसमें कहा गया था कि "यह विधि का एक अच्छी तरह से स्थापित सिद्धांत है कि किसी गलत प्रावधान का उल्लेख करने या किसी प्रावधान का उल्लेख न करने से कोई आदेश अमान्य नहीं हो जाता। यदि न्यायालय और/या वैधानिक प्राधिकरण के पास ऐसा करने का अपेक्षित क्षेत्राधिकार हो।"