पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की सरकार के लिए असली मुद्दा कश्मीर नहीं है, बल्कि वहां की सेना और लगातार गिरती हुई अर्थव्यवस्था है। आवाम का ध्यान अर्थव्यवस्था से भटकाने के लिए इमरान खान और सेना लगातार जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के हटाने का विरोध कर रहे हैं। वहां की सेना ही देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर रही है।
अगस्त 2018 से लगातार गिरावट के दौर में अर्थव्यवस्था
इमरान खान ने पिछले साल अगस्त में पाकिस्तान की सत्ता संभाली थी। तब से लेकर के अभी तक मुल्क की अर्थव्यवस्था में किसी तरह का विकास देखने को नहीं मिला है। वहां की जनता लगातार महंगाई की मार झेल रही है। सत्ता संभालने के बाद इमरान खान सरकार ने लोगों को नया पाकिस्तान बनाने का वादा किया था। लेकिन लोगों को नया पाकिस्तान में केवल बढ़ती महंगाई का दंश लगातार महसूस हो रहा है।
यह है अर्थव्यवस्था का हाल
- जीडीपी अगस्त 2018 में 5.5 फीसदी थी, जो अब 3.3 फीसदी हो गई है।
- पाकिस्तानी रुपये का लगातार अवमूल्यन हो रहा है, जिससे एक-पांचवा हिस्सा खो चुका है।
- महंगाई दर के अगले एक साल में 13 फीसदी के पार जाने की संभावना है, जो कि दस साल का उच्चतम स्तर है।
- राजकोषीय घाटा जीडीपी का 7.1 फीसदी है, जो सात साल का उच्चतम स्तर है।
- ग्रॉस पब्लिक डेट जीडीपी का 77.6 फीसदी है।
- विदेशी प्रत्यक्ष निवेश 51.7 फीसदी गिर गया है।
- विदेशी निजी निवेश में 64.3 फीसदी की गिरावट है।
यह कारण भी हैं
पाकिस्तान ऋण को चुकाने के लिए और अधिक ऋण ले रहा है। आईएमएफ, चीन और सऊदी अरब से लोन मिलने के बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। इसकै अलावा सरकारी कंपनियों को भी लगातार घाटा हो रहा है। पाकिस्तान में केवल एक फीसदी लोग ही टैक्स जमा करते हैं। यह पूरी दुनिया में सबसे कम टैक्स और जीडीपी (11 फीसदी) का अनुपात है।
सेना का अर्थव्यवस्था में दखल
पाकिस्तानी सेना का देश की अर्थव्यवस्था में भी अच्छा खासा दखल है। देश के बजट में से 22 फीसदी हिस्सा रक्षा पर खर्च होता है। इसके अलावा सेना के पास बैंकिंग, सीमेंट और रियल एस्टेट सेक्टर में भी कई कंपनियां हैं, जिसके जरिए उसे 10 हजार करोड़ डॉलर की कमाई होती है।
पाकिस्तान में फौजी फाउंडेशन के पास ज्यादातर बिजनेस हैं। फौजी फाउंडेशन के पास सीमेंट, फर्टिलाइजर, बिजली और खाद्य उत्पादन करने वाली फैक्ट्रियों का नियंत्रण हैं। इसके अलावा 15 प्रोजेक्ट का भी इसके पास नियंत्रण है।
फौजी के अलावा देश में शाहीन फाउंडेशन, बहरिया फाउंडेशन, आर्मी वेलफेयर ट्रस्ट और डिफेंस हाउसिंग अथॉरिटी (डीएचए) है, जिसके तहत 50 से अधिक व्यापार पर पूरा कंट्रोल है। डीएचए को कानून के जरिए बनाया गया है, जिसके कार्य का क्षेत्र कराची, लाहौर, रावलपिंडी, इस्लामाबाद, मुल्तान, गुंजरावाला, बाहवलपुर, पेशावर और क्वेटा में है।
भारत विरोध है अच्छा बिजनेस
पाकिस्तानी सेना के कई अधिकारियों ने कालाधन जमा कर रखा है। विदेशों में उनके पास बेनामी खाते और संपत्तियां हैं। सेना का देश की राजनीति और प्रशासन में भी काफी दखल है। दुनिया को दिखाने के लिए वो भारत के साथ अमन और बातचीत का राग आलापती है। लेकिन असलियत यह है कि भारत के खिलाफ आतंकवाद को सबसे ज्यादा शह पाकिस्तानी सेना की वजह से ही मिल रही है। यही वजह है कि पाक फौन नहीं चाहती कि कश्मीर मामला सुलझे। क्योंकि अगर ऐसा हो गया तो पाकिस्तान में सेना का नियंत्रण सीमित हो जाएगा और इसका असर फौजी फाउंडेशन के बिजनेस पर भी पड़ेगा।
अर्थव्यवस्था से नहीं है लेना-देना
पाकिस्तानी सेना को देश की अर्थव्यवस्था और वहां के नागरिकों की दयनीय हालत से किसी तरह का कोई फर्क नहीं पड़ता है। वो चाहती है कि प्रत्येक पाकिस्तानी रुपये को केवल भारत विरोध में लगाया जाए, ताकि उसका एजेंडा चलता रहे।
दिवालिया होने की कगार पर देश
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ा गई है। देश कर्ज के बोझ से दिवालिया होने के कगार पर है। सरकार को अपने पहले साल में 19 अरब का कर्ज चुकाना है। सूद की शक्ल में प्रतिदिन छह अरब रुपये अदा करने पड़ रहे हैं। चालू घाटा बढ़कर नौ अरब रुपये हो गया है। कर्ज चुकाने के लिए सरकार ने सरकारी संपत्तियों को बेचने का फैसला लिया है।