एनसीएलएटी की दो सदस्यीय बेंच, जिसमें जस्टिस अशोक भूषण और तकनीकी सदस्य बरुन मित्रा शामिल थे, ने कहा कि फाइनेंशियल सर्विस प्रोवाइडर्स के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने के लिए आईबीसी में अलग और विशेष प्रावधान हैं। आम तौर पर ऐसी कार्यवाही नियामक संस्था (जैसे आरबीआई) की पहल पर ही की जा सकती है, न कि किसी सामान्य कर्जदाता की तरफ से।
नेशनल कंपनी लॉ अपीलीय ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) ने जंबो फिनवेस्ट के खिलाफ दिवालिया कार्यवाही शुरू करने की मांग को खारिज कर दिया है। इसके साथ ही ट्रिब्यूनल ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के पहले के आदेश को सही ठहराया है। यह मामला इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक से जुड़ा है, जिसने जंबो फिनवेस्ट के खिलाफ इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) की धारा 7 के तहत याचिका दायर की थी। हालांकि, जयपुर स्थित एनसीएलटी बेंच ने पहले ही इस याचिका को खारिज कर दिया था। एनसीएलटी का कहना था कि जंबो फिनवेस्ट एक फाइनेंशियल सर्विस प्रोवाइडर (एफएसपी) है और ऐसे संस्थानों के खिलाफ सामान्य तरीके से दिवालिया कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती।
RBI ने जंबो फिनवेस्ट पर लगाई थीं कई पाबंदियां
इक्विटास बैंक ने इस फैसले को एनसीएलएटी में चुनौती दी। बैंक का तर्क था कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 16 जनवरी 2020 को जंबो फिनवेस्ट पर कई पाबंदियां लगाई थीं। इसके तहत कंपनी को न तो अपना कारोबार बढ़ाने की अनुमति थी और न ही वह सार्वजनिक धन जुटा सकती थी या लोन दे सकती थी। बैंक ने दलील दी कि इन प्रतिबंधों के बाद जंबो फिनवेस्ट को फाइनेंशियल सर्विस प्रोवाइडर नहीं माना जाना चाहिए।
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14 अक्तूबर को रद्द हुआ था जंबो फिनवेस्ट का रजिस्ट्रेशन
लेकिन एनसीएलएटी ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। ट्रिब्यूनल ने साफ कहा कि आरबीआई की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों से जंबो फिनवेस्ट की फाइनेंशियल सर्विस प्रोवाइडर की पहचान खत्म नहीं होती। एनसीएलएटी ने यह भी बताया कि जंबो फिनवेस्ट का रजिस्ट्रेशन 14 अक्तूबर को रद्द हुआ था, यानी उस तारीख तक वह एक पंजीकृत एफएसपी थी।
ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि सेक्शन सात की याचिका खारिज होने का मतलब यह नहीं है कि इक्विटास बैंक के पास अपने बकाये की वसूली के लिए कोई रास्ता नहीं है। बैंक कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपाय अपना सकता है। इस तरह, एनसीएलएटी ने जंबो फिनवेस्ट के पक्ष में फैसला सुनाते हुए एनसीएलटी के आदेश को बरकरार रखा।