हालात से निपटने के लिए क्या जुगाड़ और विकल्प अपनाए जा रहे हैं?
जवाब: संकट से बचने के लिए कारोबारी और सरकार अलग-अलग तरह के विकल्प आजमा रहे हैं:
- इलेक्ट्रिक और माइक्रोवेव: आईआरसीटीसी ने रेलवे स्टेशनों पर अपनी कैटरिंग यूनिट्स को इंडक्शन और माइक्रोवेव का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया है।
- लकड़ी और कोयला: भुवनेश्वर नगर निगम ने सड़क किनारे के ढाबों के लिए कोयले और जलाऊ लकड़ी पर लगा प्रतिबंध फिलहाल हटा लिया है। वहीं मुंबई की बेकरियां भी अपने पुराने लकड़ी वाले ओवन फिर से चालू करने की अनुमति मांग रही हैं।
- बायोगैस का उपयोग: बेंगलुरु की 'एम्पायर रेस्टोरेंट चेन' ने बायोगैस प्लांट के ईंधन से काम चलाना शुरू कर दिया है। इसके सीईओ शाकिर हक का कहना है कि भविष्य के लिए डुअल-फ्यूल (दोहरे ईंधन) सिस्टम पर विचार किया जा रहा है।
- और क्या उपाय हो रहे? यूपी में मिट्टी के तेल (केरोसिन) को आपातकालीन विकल्प के रूप में देखा जा रहा है, जबकि महाराष्ट्र नेचुरल गैस लिमिटेड पुणे के रेस्टोरेंट्स को पाइप्ड गैस कनेक्शन देने की पेशकश कर रही है। इसके अलावा, सरकार ने रिफाइनरियों को उत्पादन बढ़ाने के आपातकालीन आदेश भी दिए हैं।
आगे क्या होने वाला है?
जवाब: स्थिति अभी चुनौतीपूर्ण है। बेंगलुरु पीजी ओनर्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष अरुणकुमार डीटी के अनुसार, पीजी के पास मुश्किल से 4-5 दिन का गैस स्टॉक बचा है। कम ऊर्जा वाले व्यंजन बनाकर इसे दो दिन और खींचा जा सकता है। जब तक गैस की आपूर्ति स्थिर नहीं हो जाती, तब तक सामान्य मेन्यू पर वापस आना मुश्किल है।
पश्चिम एशिया के इस भू-राजनीतिक संकट ने यह साबित कर दिया है कि हमारी रसोई भी ग्लोबल सप्लाई चेन से गहराई से जुड़ी है। जब तक हालात सामान्य नहीं होते, तब तक आम आदमी को बाहर खाने में सीमित विकल्पों से ही काम चलाना पड़ेगा। यह स्थिति रेस्तरां और कारोबारियों के लिए एक बड़ा सबक है कि किसी एक तरह के ईंधन पर निर्भर रहना कितना जोखिम भरा हो सकता है।