1988 में अपनी राह खोजने के जज्बे के साथ आईआईएम, अहमदाबाद से निकली माधबी पुरी बुच पहली महिला व दूसरी गैर-आईएएस सेबी प्रमुख हैं और अर्थजगत के आंकड़ों में वर्षों से अपनी अद्वितीयता साबित करती आई हैं। फिलहाल एक अमेरिकी शॉर्टसेलर के आरोपों से चर्चा में हैं, यह बात दीगर है कि आरोप लगाने वाले की विश्वसनीयता खुद सवालों के घेरे में है।
1988 का साल था। आईआईएम, अहमदाबाद के उस बैच के करीब सभी विद्यार्थियों का कैंपस प्लेसमेंट हो चुका था। लेकिन एक लड़की थी, जिसने खुद को प्लेसमेंट की प्रक्रिया से अलग कर लिया था। आईआईएम उसे शुभकामनाएं ही दे सकता था। लेकिन वह लड़की जो तब अपनी राह की खोज में निकली थी, करीब तीन दशक बाद संस्थान के 59वें दीक्षांत समारोह में बतौर चीफ गेस्ट लौटती है। इस मौके पर आईआईएम, अहमदाबाद अपने एक्स अकाउंट पर लिखता है, ‘आईआईएम-ए 1988 बैच की उस पूर्व छात्रा की वापसी पर आनंदित है, जिसने अपने नियम खुद लिखे, प्लेसमेंट के बजाय अपना रास्ता खुद चुना और सेबी की पहली महिला अध्यक्ष बन कर इतिहास रचा।’ वही माधबी पुरी बुच आज कथित आरोपों के घेरे में हैं। पिछले साल अदाणी समूह को निशाना बना कर भूचाल पैदा करने वाले अमेरिकी शॉर्टसेलर हिंडनबर्ग ने अब तक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा भेजे गए नोटिस का जवाब बेशक न दिया हो, लेकिन पेरिस ओलंपिक के समापन से ठीक एक दिन पहले यानी दस अगस्त को सेबी को ही आंकड़ों के जाल में फंसाकर उसकी अध्यक्ष माधबी पुरी बुच पर कथित भ्रष्टाचार के आरोप जरूर लगा दिए हैं। कथित तौर पर, माधबी पुरी बुच और उनके पति धवल बुच पर उद्योगपति विनोद अदाणी को फायदा पहुंचाने और उनसे लाभ लेने के आरोप लगे हैं, जिन्हें सेबी प्रमुख ने निराधार बताया है।
शुरुआत: भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में 1966 में पैदा हुई माधबी के पिता एक सफल कॉर्पोरेट पेशेवर थे, जिन्होंने उन्हें महत्वाकांक्षा का मूल्य सिखाया, जबकि मां राजनीति विज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त स्कॉलर थीं। मुंबई के फोर्ट कॉन्वेंट स्कूल और दिल्ली के कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी स्कूल से स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद माधबी ने सेंट स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली से गणित विषय में स्नातक करने के बाद आईआईएम, अहमदाबाद से एमबीए किया।
विवाह: धवल बुच से 18 वर्ष की उम्र में उनकी मुलाकात हुई और जब वह 21 वर्ष की थीं, तब उनका विवाह हो गया। उनका एक बेटा अभय है। माधबी अपनी सफलता का श्रेय अपने बेटे और पति को देती हैं, जिन्हें वह अपना दोस्त, दार्शनिक और मार्गदर्शक कहती हैं। धवल बुच अनुभवी बिजनेसमैन हैं। वह वर्तमान में ब्लैकस्टोन और अल्वारेज एंड मार्शल में वरिष्ठ सलाहकार हैं। उन्होंने आईआईटी, दिल्ली से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल की है।
आंकड़ों से प्यार: माधबी को ‘आंकड़े’ शुरू से आकर्षित करते रहे हैं। कहती हैं कि तकनीकी का प्रयोग व बाजार की आंकड़ेबाजी उन्हें पसंद है। वह बाजार की रग-रग से वाकिफ हैं। माधबी को एक मांग करने वाली लीडर के रूप में जाना जाता है और उनके निर्णयों के आधार सटीक आंकड़े होते हैं।
26/11 मुंबई हमले में बचीं
माधवी बुच 26 नवंबर, 2008 को मुंबई के ताज होटल में हुए आतंकी हमले में जीवित बचे लोगों में से एक हैं। वह हमले के समय अपने पति के साथ ताज होटल में ही थीं, जो उस समय यूनिलीवर की एक बैठक में भाग लेने गए थे।
आईसीआईसीआई से सेबी
वर्ष 1989 में माधवी बुच ने आईसीआईसीआई बैंक के साथ जुड़कर अपने कॅरिअर की शुरुआत की। आईसीआईसीआई में उन्होंने अपने कार्यकाल में निवेश बैंकिंग से लेकर विपणन और उत्पाद विकास तक में कई भूमिकाएं निभाईं। वह वर्ष 2009 में आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज की प्रबंध निदेशक और सीईओ बनने वाली पहली महिला बनीं।
- आईसीआईसीआई छोड़ने के बाद बुच ने चीन के शंघाई में न्यू डेवलपमेंट बैंक में सलाहकार के तौर पर काम किया। वह ब्रिक्स बैंक के साथ भी जुड़ी रहीं।
- वर्ष 2017 में सेबी की पूर्णकालिक सदस्य और एक मार्च, 2022 को सेबी का नेतृत्व करने वाली पहली महिला बनीं। सेबी में उनका नेतृत्व नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सिक्योरिटीज मार्केट्स को और भारत के वित्तीय बाजारों को आधुनिक बनाने के नीतिगत सुधारों को आगे बढ़ाने में सहायक रहा है।
- 2018 में सहारा समूह को निवेशकों से जुटाए 14 हजार करोड़ रुपये लौटाने का आदेश दिया था।
- हिंडनबर्ग के आरोप से पहले बुच पर एनएसई को-लोकेशन घोटाले के आरोप भी लगे थे, जिस संबंध में उनसे संसदीय समिति ने पूछताछ भी की थी।
मुश्किल बॉस और असंभव अधीनस्थ
अपने बारे में माधवी कहती हैं कि मैंने पिछले 35 साल अपने काम का खूब आनंद लिया है। मुझे कई तरह के काम करने का मौका मिला और नए बिजनेस खड़े किए। मैं काम करने की कोई भी कोशिश नहीं छोड़ती। मेरे साथ किसी मुद्दे का समाधान करना ‘प्याज के छिलके उतारने जैसा’ है। मैं एक मुश्किल बॉस और असंभव अधीनस्थ हूं।
मां से प्रेरणा
कुछ भी कर गुजरने की प्रेरणा उन्हें अपनी मां से मिली। उनकी मां रमा ने 40 वर्ष की उम्र में पीएचडी तब की, जब उन्हें दो बच्चों की देखभाल भी करनी पड़ती थी। उन्होंने कई किताबें लिखीं, तो विभिन्न देशों की यात्राएं भी कीं। एक पेशेवर महिला अपने पेशे को सार्थक बनाने के लिए क्या कुछ नहीं कर सकती, इसका प्रशिक्षण माधबी को अपनी मां से मिला।