इस घोटाले को संदिग्ध शेल कंपनियों/पास-थ्रू कंपनियों को बहुत बड़ी रकम का जमानती और गैर जमानती कर्ज देकर अंजाम दिया गया। ये सभी शैल कंपनियां डीएचएफएल के मालिकों: कपिल वधावन, अरुणा वधावन और धीरज वधावन से संबंधित हैं। इन लोगों ने कंपनी की वित्त समिति में अपनी सदसयता होने से मिली शक्तियों का फायदा उठाया।
इस कंपनी के वित्त समिति के सदस्यों को यह हक मिलता है कि वह 200 करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज की मंजूरी दे सकें। इसका इस्तेमाल करते हुए इन लोगों ने अपने द्वारा बनाई गयी फर्जी कंपनियों को लोन दिया और उसका इस्तेमाल अपने निजी फायदे के लिए किया। इन लोगों ने एक लाख के मामूली पूंजी से दर्जनों फर्जी कंपनियां बनाईं। इन सारी कंपनियों के पते एक हैं और इनके डायरेक्टर भी एक हैं। यहां तक कि इन कंपनियों के खातों की जांच करने वाले ऑडिटरों भी एक ही समूह से जुड़े हैं।
साल 2017-18 में ऑडिट की गई वित्तीय रिपोर्ट के अनुसार डीएचएफएल की कुल संपत्ति 8,795 करोड़ रुपये है, जबकि लेनदारी बहुत ज्यादा है। कंपनी ने बैंकों (भारतीय और विदेशी दोनों) के साथ-साथ वित्तीय संस्थानों से 96,880 करोड़ रुपये का कर्जा ले रखा है। वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने कम से कम 36 बैंकों से कर्ज लिया है- जिसमें 32 राष्ट्रीयकृत और निजी बैंकों के साथ-साथ छह विदेशी बैंक भी शामिल हैं। 32 राष्ट्रीयकृत बैंकों में, भारतीय स्टेट बैंक ने डीएचएफएल को सबसे ज्यादा 12,000 करोड़ रुपये का कर्ज स्वीकृत किया था। इसके बाद बैंक ऑफ बड़ौदा (4,396 करोड़), बैंक ऑफ इंडिया (4,150 करोड़) और केनरा बैंक (3,100 करोड़) का नंबर आता है।
जारी हुआ था लुकआउट नोटिस
दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉर्पोरेशन के प्रवर्तकों के खिलाफ 28 मई को लुकआउट नोटिस जारी हुआ था। इसके बाद कंपनी के शेयर गिर गए थे। मुखौटा कंपनियों में पैसे जमा करने के आरोप में सरकार ने प्रवर्तकों और निदेशकों के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया था। जिन लोगों के खिलाफ नोटिस जारी हुआ है, उनमें कपिल वधावन, अरुणा वधावन और धीरज वधावन शामिल हैं।
कंपनी पर 83,873 करोड़ रुपये बकाया
डीएचएफएल के रिजॉल्यूशन प्लान के अनुसार, कंपनी पर नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर (एनसीडी) का 41.431 करोड़ रुपये बकाया है। वहीं बैंकों का 27,527 करोड़ रुपये, 6,188 करोड़ की एफडी, 2,747 करोड़ रुपये की एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग (ईसीबी), नेशनल हाउसिंग बैंक (एनएचबी) के 2,350 करोड़, सब-कर्ज और पर्पेचुअल कर्ज क्रमश: 2,267 करोड़ और 1.263 करोड़ रुपये और कमर्शियल पेपर 100 करोड़ रुपये के हैं। इस तरह कंपनी पर कुल 83,873 करोड़ रुपये बकाया है।
कंपनी ने बनाई थी निपटान की योजना
केपीएमजी के फॉरेंसिक ऑडिट में भी डीएचएफएल के प्रमोटर्स द्वारा बड़े स्तर पर अनियमितताएं बरतने का पता चला है। कंपनी ने जो निपटान की योजना बनाई थी, उसमें कर्ज को इक्विटी में बदलकर कंपनी की 51 फीसदी हिस्सेदारी प्राप्त करना भी शामिल था। केपीएमजी द्वारा कर्जदाताओं को सौंपी गए रिपोर्ट के मसौदे के अनुसार, डीएचएफएल के प्रमोटर्स ने लगभग 20 हजार करोड़ का बैंक लोन अपनी युनिट्स में ट्रांसफर किया है।
डीएचएफएल के खिलाफ हाउसिंग फाइनेंस सेक्टर में 31 हजार करोड़ रुपये के घोटाले का भी आरोप है। केंद्र सरकार ने डीएचएफएल के खिलाफ जांच करने के लिए सीरियस फ्रॉड इंवेस्टिगेशन ऑफिस (एसएफआईओ) को आदेश भी दिया था। कंपनी पर आरोप है कि उसने बैंकों से लिए 31 हजार करोड़ रुपये के लोन को शैल कंपनियों में निवेश किया था।
फंड जुटाने की क्षमता काफी कम
डीएचएफएल ने सितंबर 2018 से मुख्य रूप से परिसंपत्तियों के प्रतिभूतिकरण और पुनर्भुगतान संग्रह के माध्यम से 41,800 करोड़ रुपये से अधिक का पुनर्भुगतान किया था। कंपनी वित्तीय संकट से गुजर रही है और फंड जुटाने की क्षमता काफी कम हो गई है। कंपनी को इस साल जनवरी-मार्च की पहली तिमाही में 2,223 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था।