रूरल इंडिया क्राफ्ट संस्था के बचन सिंह रावत का कहना है कि बिच्छू घास की प्रदेश में व्यावसायिक खेती नहीं होती है। ऐसे में कच्चा माल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। जबकि इन उत्पादों की भारी मांग है। मंगरौली गांव में कंडाली के रेशे से उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।
देश के कई राज्यों के कारोबारियों ने ऑर्डर देने के लिए संपर्क किया है। उद्योग विभाग की ओर से जैकेट को निर्यात करने के लिए उसके नमूने विदेश भेजे गए हैं। उनका कहना है कि सरकार प्रदेश में नेचुरल फाइबर को बढ़ावा देती है, तो इससे लोगों को रोजगार मिलने की ज्यादा संभावना है। देहरादून के शेरपुर में 120 महिलाओं को संस्था की ओर से इसका प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
पराबैंगनी किरणों से बचाता है यह जैकेट
बिच्छू घास से तैयार रेशा पराबैंगनी किरणों से बचाता है। इसके रेशे से बनी जैकेट को गर्मी व सर्दी दोनों ही मौसम में पहना जा सकता है। साथ ही यह देखने में दूसरे जैकेट से आकर्षक लगता है।
बिच्छू घास की बनती है सब्जी
पर्वतीय क्षेत्रों में बिच्छू घास की पत्तियों को हरी सब्जी के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। हालांकि अब लोगों के रहन-सहन, खाना-पान का तौर तरीका बदलने से इसे गिने चुने लोग ही सब्जी के रूप में प्रयोग करते हैं।