वैश्विक तकनीकी कंपनियों को प्राकृतिक संसाधनों पर अपने बढ़ते प्रभाव और उन पर निर्भरता को लेकर तत्काल कदम उठाने की जरूरत है। ऐसा न करने पर न केवल उनकी सामाजिक स्वीकार्यता बल्कि दीर्घकालिक कारोबारी स्थिरता भी खतरे में पड़ सकती है। यह चेतावनी विश्व आर्थिक मंच (WEF) की एक ताजा रिपोर्ट में दी गई है।
डब्लूईएफ के अनुसार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्लाउड कंप्यूटिंग, हाई-परफॉर्मेंस इलेक्ट्रॉनिक्स और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी नई तकनीकों के चलते यह सेक्टर आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ेगा। लेकिन रिपोर्ट आगाह करती है कि इस विस्तार की एक भारी पर्यावरणीय कीमत भी चुकानी पड़ रही है।
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रिपोर्ट के मुताबिक, केवल सेमीकंडक्टर निर्माण में ही हर साल 1 ट्रिलियन लीटर से अधिक ताजे पानी की खपत होती है, साथ ही बड़ी मात्रा में धातुओं और महत्वपूर्ण खनिजों का इस्तेमाल किया जाता है। दूसरी ओर, डेटा सेंटर 60 गीगावॉट से अधिक ऊर्जा की मांग करते हैं, जो अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य की पीक पावर जरूरतों के बराबर है।
तकनीकी विकास के साथ इलेक्ट्रॉनिक कचरे की समस्या भी गंभीर होती जा रही है। हर साल लगभग 60 अरब किलोग्राम ई-वेस्ट पैदा होता है, जिसमें से 25 प्रतिशत से भी कम का पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) हो पाता है।
WEF ने चेताया कि अगर इन पर्यावरणीय प्रभावों को नहीं संभाला गया, तो टेक सेक्टर का निकट भविष्य और दीर्घकालिक मजबूती दोनों खतरे में पड़ सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि मई 2024 से अब तक अमेरिका में 64 अरब डॉलर की डेटा सेंटर परियोजनाएं स्थानीय विरोध के कारण रोकी गईं या विलंबित हुई हैं। इन विरोधों की मुख्य वजह प्राकृतिक संसाधनों और बिजली की बढ़ती मांग है।
रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि 'नेचर-पॉजिटिव' रणनीतियां अपनाने से कंपनियों के लिए वित्तीय अवसर भी पैदा हो सकते हैं। इसमें पुराने उपकरणों से धातुओं की रिकवरी, ऊर्जा और पानी की खपत घटाकर लागत में बचत जैसे फायदे शामिल हैं।
WEF ने टेक कंपनियों को कई प्राथमिक कदम सुझाए हैं, जिनमें शामिल हैं: