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खास-बातचीत: खाली सीटों के सौदागर ने ओला-उबर को दी शिकस्त

सार

रैपिडो के सह-संस्थापक पवन गुंटुपल्ली से संजय अभिज्ञान की हुई खास बातचीत के अंश...
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रैपिडो के सह-संस्थापक पवन गुंटुपल्ली। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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देश के 90 फीसदी दोपहिया वाहनों की पिछली सीट खाली रहती है। इस बात से दुखी गुंटुपल्ली का कहना है कि केंद्र व राज्य सरकारें साथ दें तो यह खाली सीट नौजवानों को रोजगार देने और शहरों का प्रदूषण घटाने में क्रांतिकारी भूमिका निभा सकती है।

  • 100 शहरों में दोपहिया और ऑटो के 35 लाख ड्राइवरों को पार्ट टाइम या फुलटाइम रोजगार देने वाली सिर्फ सात साल पुरानी कंपनी आज अपने सेगमेंट में ओला-उबर से आगे निकल चुकी है।
  • रैपिडो देश का तीसरा सबसे बड़ा राइड शेयरिंग प्लेटफॉर्म भी है। उसका दावा है कि वह हर महीने एक करोड़ राइड ट्रांजेक्शन को अंजाम देती है।
  • बंगलूरू स्थित मुख्यालय वाली कंपनी का कहना है कि इसमें से 35 फीसदी ऑटो से और बाकी दोपहिया से आती हैं।

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कब और कैसे शुरू हुई रैपिडो की कहानी?
दक्षिण कोरिया में मिले एक सबक से हमारी कहानी शुरू होती है। आईआइटी खड़गपुर में पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने सैमसंग के रिसर्च सेक्शन में नौकरी की और उससे मुझे दक्षिण कोरिया की सैर का मौका मिला। वहां मैं देखता था कि 16-17 साल की उम्र के बाद लड़के और लड़कियां रेस्तरां-होटल जैसी जगहों पर पार्ट टाइम करने लगते हैं। मां-बाप से पैसा लेना बंद कर देते हैं। सोचता था कि हमारे मुल्क में ऐसा क्यों नहीं हो सकता। आईआईटी भुवनेश्वर से पढ़े मेरे दोस्त अरविंद सांका भी ऐसे सवालों से जूझते रहते थे। वह भी तब, जब फ्लिपकार्ट में नौकरी कर रहे थे। अक्तूबर, 2015 में वक्त आया, जब अपनी-अपनी नौकरी छोड़कर ऐसे स्टार्टअप का सपना देखा जो वाकई देश के लाखों नौजवानों को पार्ट टाइम रोजगार दे सकता था। वह भी अपना घर-बार या शहर छोड़े बगैर!  बस, वही रैपिडो का स्टार्टिंग प्वाइंट था।

ओला-उबर के शोर में दोपहिया-आटो के इस एप को लोगों ने कैसे स्वीकार किया?
शुरू में थोड़ी हिचक थी, लेकिन बाद में खुल कर गले लगाया। इसलिए कि यह बहुत आसान था और अब इस आइडिया का वक्त आ गया था। देखिए, देश में तब नए-पुराने कोई 20 करोड़ दोपहिया वाहन मौजूद रहे होंगे। लगभग हर दूसरे घर में दोपहिया वाहन होते ही थे। यह भी सच था कि 90 फीसदी से ज्यादा दोपहिया वाहनों की पिछली सीट खाली रहती थी।

  • बस ऐसी तकनीक का इंतजार था, जो स्कूटर की खाली सीट को एक्स्ट्रा इनकम का जरिया बना सके। हमने उसी वैक्यूम को पूरा किया। रैपिडो ने लाखों ऐसे दोपहिया चालकों को उन लाखों लोगों से जोड़ दिया, जो  सस्ती सवारी की तलाश में थे।

कार के मुकाबले कितनी किफायती है दोपहिया एप की सवारी?

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हमारी रिसर्च के मुताबिक कार और टैक्सी के मुकाबले दोपहिया टैक्सी 40 से 60 फीसदी तक सस्ती होती है। साथ ही, यह यात्रा 40 फीसदी तक कम वक्त में पूरी हो जाती है। मतलब कीमत और वक्त दोनों की बचत।

वक्त की बचत कैसे?
ट्रैफिक जाम में कार के मुकाबले दोपहिया वाहन जल्दी निकल जाते हैं। बाइक-स्कूटर पतली गलियों में भी दौड़ लेते हैं। दोपहिया वाहनों के ड्राइवर गूगल मैप को मात देने वाले रास्तों के खिलाड़ी होते हैं।

आप तो सांसों की बचत का दावा भी करते हैं?
प्रदूषण घटाने का एक शानदार तरीका है कि लोग कार छोड़ दोपहिया पर चलें। कम कारों का मतलब है कम ट्रैफिक और कम जाम। याद रखना होगा कि कारों के मुकाबले दोपहिया वाहनों के इलेक्ट्रिक बनने की रफ्तार ज्यादा है। आज अगर देश में चल रहे करीब 22 करोड़ दोपहिया वाहनों की पिछली सीट सवारी के काम आने लगे तो अंदाजा लगाइए कि कार्बन फुटप्रिंट्स कितने कम हो जाएंगे और शहरों की हवा कितनी सांस लेने लायक हो जाएगी।

रैपिडो से जुड़े कितने दोपहिया-तिपहिया इलेक्ट्रिक हैं?
यह अनुपात एक फीसदी से भी कम है। लेकिन, सरकार चाहे तो आने वाले समय में यहां बाइक-टैक्सी क्रांतिकारी काम कर सकती हैं।

इसे थोड़ा और स्पष्ट करेंगे?
देखिए, अभी 100 किलोमीटर रेंज वाला इलेक्ट्रिक स्कूटर एक से सवा लाख रुपये का आता है। रेंज मतलब एक रीचार्ज में तय होने वाली कुल दूरी। इस दाम में स्कूटर निर्माताओं को प्रति किलोवॉट बैटरी क्षमता पर मिलने वाली 20 हजार रुपये की सरकारी सब्सिडी शामिल है। लेकिन, रैपिडो जैसे एप में चलने वाली दोपहिया टैक्सियों को कम-से-कम 200 किलोमीटर रेंज वाली बैटरी के वाहन की जरूरत होती है। लेकिन, इस रेंज तक रखने वाली बैटरी की कीमत इतनी ज्यादा होती है कि दोपहिया वाहन की कीमत दो से ढाई लाख रुपये तक पहुंच जाएगी। ऐसे में सरकार को पार्ट टाइम या फुलटाइम राइड शेयरिंग देने वाले दोपहिया टैक्सी ड्राइवरों के लिए सब्सिडी का अलग से इंतजाम करना चाहिए।

अभी तक देश में कितने लोगों को रैपिडो से रोजगार मिला है ?
सौ शहरों में हमारे चार लाख से ज्यादा सक्रिय ड्राइवर-पार्टनर हैं, जिन्हें हम कैप्टन कहते हैं। पुराने कैप्टन भी जोड़ लें तो संख्या 35 लाख से ज्यादा होगी। रैपिडो एप के ढाई करोड़ से ज्यादा डाउनलोड हैं। हमारे डेढ़ करोड़ रजिस्टर्ड कस्टमर हैं। बाइक टैक्सी-ऑटो श्रेणी में हम देश की पहली और सबसे बड़ी कंपनी हैं।

इनमें छोटे शहरों का कितना योगदान है?
हमारी 40 फीसदी राइड्स टियर-2 या टियर-3 के छोटे शहरों से आती हैं। वहां के नौजवान कैप्टन बनकर अपने शहर, कस्बे या गांव में रहकर ही पार्ट टाइम रोजगार पा रहे हैं। महानगरों में मांग ज्यादा है। हैदराबाद, दिल्ली और बंगलूरू ऐसे शहर हैं, जो हर रोज दो लाख सवारियां दर्ज कराते हैं। लेकिन, तब भी वहां केवल 25 फीसदी मांग पूरी हो पा रही है। भविष्य में वृद्धि की जबरदस्त गुंजाइश है।

इनमें उत्तर प्रदेश का कितना योगदान है?
लखनऊ समेत उत्तर प्रदेश के 9 शहरों में हम सक्रिय हैं। वहां हमारे 25 हजार से ज्यादा कैप्टन हैं। उत्तर प्रदेश के कारोबार का 90 फीसदी दोपहिया से और 10 फीसदी ऑटो से आता है। राज्य में हर रोज हम एक लाख 70 हजार लोगों को सफर कराते हैं।

कितनी सुरक्षित है बाइक टैक्सी की राइड?
पहले दिन से इंश्योरेंस सुविधा होती है। बिना एक्स्ट्रा हेलमेट के हमारे ड्राइवर नहीं चलते। नियुक्ति से पहले उनकी ट्रेनिंग होती है। उनके व्यवहार के लिए बीहैवरियल ट्रेनिंग देते हैं। फिर वाहनों की रियलटाइम ट्रैकिंग होती है। ओवरस्पीड, गलत रूट, फास्ट टर्न पर एप से फौरन वार्निंग अलर्ट ड्राइवर को जाता है। कस्टमर के लिए पैनिक बटन होता है। हर ड्राइवर के काम का रिकॉर्ड हमारे पास होता है। तभी जोखिम वाली ड्राइविंग या रोड रेज वगैरह पर नियंत्रण रख पाते हैं। बंगलूरू में 200 सुप्रशिक्षित अधिकाारियों की एक टीम अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर की मदद से 24 घंटे निगरानी का काम करती है।

  • उद्यम के दो स्तंभ होते हैं। सरोकार व जुनून। इनमें एक भी नहीं रहा तो उद्यम को अलविदा कह देना चाहिए।


आपके ड्राइवरों की औसत आयु क्या है? इनमें कितनी महिलाएं हैं?
हमारे ड्राइवरों में ज्यादातर 20 से 40 साल की उम्र के हैं। इनमें भी 20 से 30 साल की उम्र वाले ज्यादातर कैप्टन पार्ट टाइमर हैं। 30 से 40 आयु वर्ग वाले ज्यादातर फुल टाइमर हैं। दूसरी तरह से देखें तो हमारे 70 फीसदी ड्राइवर पार्ट टाइमर के तौर पर काम करते हैं।  कुल ड्राइवरों में 5 से 7 फीसदी महिलाएं हैं। हम गुवाहाटी, चेन्नई जैसे कई शहरों में एनजीओ की मदद से लड़कियों को प्रशिक्षण दे रहे हैं ताकि वे भी रोजगार पा सकें। उन्हें किराये पर वाहन भी दिलाने में मदद कर रहे हैं।

सिर्फ लड़कियों को विशेष प्रशिक्षण क्यों?
एक तो बेटियों को सशक्त बनाने का सामाजिक मकसद है। दूसरे, इससे ही भविष्य में हमारे महिला कस्टमरों की संख्या बढ़ेगी। दोपहिया राइड लेने वाली महिला तभी ज्यादा सुरक्षित महसूस करेगी, जब ड्राइवर महिला ही हो। अभी रैपिडो से राइड बुक कराने वाले हमारे कुल कस्टमर में 22 फीसदी ही महिलाएं हैं। हम जल्द इसे 50 फीसदी तक ले जाना चाहेंगे।

आगे की रणनीति का मुख्य बिंदु?
हम चाहते हैं कि वर्ष 2027 तक हम देश में हर रोज 70 लाख सवारियों के सफर का माध्यम बन जाएं। लोग घर से बाहर निकलें तो रैपिडो की मार्फत आएं वाहन पर बैठकर ही अपनी मंजिल तक सफर तय करें।

नए उद्यमियों और स्टार्टअप के लिए कोई खास नसीहत देना चाहेंगे?
चाहे दुनिया कितना ही नामुमकिन बताए, अपने आइडिया पर कोशिश जरूर करें। सात साल पहले बाइक टैक्सी की बात पर न तो ड्राइवरों को यकीन होता था न कस्टमर को। हर रोज 500 राइड व 10 हजार डाउनलोड तक पहुंचने में दो महीने लगे थे।

बाद में कितने ही उतार-चढ़ाव आए। गलतियों से सीखा भी। आज अपने सेगमेंट में टॉप पर हैं, तब भी संतुष्ट होकर नहीं बैठै हैं। नौजवानों से भी कहना चाहूंगा कि मां-बाप के पैसे से नहीं, अपनी पार्ट टाइम कमाई से खर्च पूरे कीजिए। गर्व के साथ रैपिडो का कैप्टन बनिए।

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