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भारतीय अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ेगा महंगे क्रूड से बढ़ता आयात बिल

Mon, 29 Apr 2019 04:08 AM IST
गौरव द्विवेदी बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • 66.57 डॉलर प्रति बैरल था 2 जनवरी 2019 को क्रूड का दाम
  • 72.15 डॉलर प्रति बैरल थी बीते 27 अप्रैल को क्रूड की कीमतें
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कच्चा तेल (प्रतीकात्मक तस्वीर)
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विस्तार
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दुनियाभर में पेट्रोल-डीजल जैसे जीवाश्म ईंधन की कीमतें तय करने के लिए ब्रेंट क्रूड नामक व्यापारिक वर्गीकरण का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्लेटफॉर्म पर पिछले छह महीने में ब्रेंट क्रूड के दाम बढ़कर 75 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के पार चले गए हैं, यह उछाल करीब 40 फीसदी रहा। इसकी वजह है अमेरिका, जिसने ईरान से तेल आयात करने वाले भारत सहित आधा दर्जन देशों को दी गई ढील खत्म करने का ऐलान किया है। इसके अलावा ओपेक देशों और रूस के 12 लाख बैरल प्रतिदिन उत्पादन घटाने का असर भी कीमतों पर बखूबी पड़ा है। हमारे कुल आयात में करीब एक चौथाई हिस्सा क्रूड का होता है। लिहाजा इसमें कीमतें बढ़ने से अचानक देश का आयात बिल भी बढ़ जाता है। 

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पिछले साल तक हमने ईरान से अपनी जरूरत का 10 फीसदी तेल आयात किया और वह हमारा तीसरा सबसे बड़ा निर्यातक बना रहा। 2018-19 में भारत ने 2.3 करोड़ टन कच्चा तेल ईरान से खरीदा, लेकिन 2 मई के बाद प्रतिबंध प्रभावी होने से हमें नए स्रोत तलाशने होंगे। इस कदम से तेल कीमतों पर असर पड़ना तय है और हमारा आयात बिल भी बढ़ेगा।

सरकार के घाटे में होगा इजाफा

बीते साल भारत सरकार ने कुल 507 अरब डॉलर का आयात किया, जिसमें सबसे एक चौथाई हिस्सेदारी सिर्फ क्रूड ऑयल की रही। इस दौरान 114 अरब डॉलर का क्रूड भारत को खरीदना पड़ा, जो कुल आयात का 23 फीसदी रहा। जैसे-जैसे क्रूड की कीमतें बढ़ेंगी हमारे आयात पर बोझ भी बढ़ता जाएगा, जो हमारी अर्थव्यवस्था को घाटे में ले जाएगा। क्रूड में एक डॉलर का इजाफा होने पर भी आयात बिल 6,160 करोड़ बढ़ जाता है, ऐसे में अगर तेल के दाम 80 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचे तो बिल का बोझ 30 हजार करोड़ से ज्यादा बढ़ेगा और इसी अनुपात में सरकार का घाटा भी बढ़ जाएगा।
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घरेलू उत्पादन में गिरावट से मुश्किल

वैश्विक स्तर पर क्रूड की मार झेल रहे भारत की मुश्किलें घरेलू उत्पादन में गिरावट से और बढ़ गई है। वित्त वर्ष 2011 में भारत ने 3.77 करोड़ टन कच्चे तेल का उत्पादन किया था, जो 2012 में बढ़कर 3.81 करोड़ हो गया। लेकिन इसके बाद से लगातार गिरावट आ रही है, जो 2013 में 3.79 करोड़ टन, 2014 मेें 3.78 करोड़ टन, 2015 में 3.75 करोड़ टन, 2016 में 3.69 करोड़ टन और 2017 में 3.60 करोड़ टन हो गया। बीते साल बड़ी गिरावट आई और उत्पादन 2018 में घटकर 3.57 करोड़ टन पर आ गया। 

लगातार घट रहा रुपये का कद

तेल कीमतों में उछाल ने डॉलर के मुकाबले रुपये को फिर कमजोर करना शुरू कर दिया है, जो सात सप्ताह के निचले स्तर को छूते हुए 70 रुपया प्रति डॉलर के पार जा पहुंचा है। चूंकि, भारत को तेल के बदले डॉलर में भुगतान करना होेता है, ऐसे में रुपये का छोटा कद बड़ी मुसीबत बन जाएगा। विभिन्न एजेंसियों का अनुमान है कि अगर तेल कीमतें ऐसे ही बढ़ती रहीं तो हर साल डॉलर के समक्ष रुपये की कीमत तीन से चार प्रतिशत घट जाएगी। यह महंगाई बढ़ने की बड़ी वजह बन सकता है। 

सरकार की कमाई पर चल सकती है कैंची

तेल खपत के मामले में भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। ऐसे में यह सरकार की कमाई का सबसे बड़ा जरिया भी है। तेल कीमतों में बढ़ोतरी और खपत में उछाल से लगातार सरकार का राजस्व भी बढ़ रहा है। 2015 में केंद्र और राज्य सरकारों ने पेट्रोलियम उत्पादों से 2.86 लाख करोड़ रुपये की कमाई की। इसमें केंद्र का हिस्सा 1.26 लाख करोड़ और राज्यों का 1.40 लाख करोड़ रुपये रहा। यह कमाई 2018-19 में बढ़कर क्रमश: 2.78 लाख करोड़ और 2.30 लाख करोड़ रुपये हो गई। खुदरा बाजार में पेट्रोल-डीजल महंगा होने से सरकार को एक्साइज ड्यूटी में कमी करनी पड़ सकती है। इस कदम से उसकी कमाई पर भी असर होगा।
 

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आयात में बढ़ती कच्चे तेल की हिस्सेदारी

वित्त वर्ष        कुल आयात       कच्चा तेल
2015             448                115     
2016             381                65.9
2017             384                70.7
2018             466                87.4
2019(फरवरी)   507               114
(आंकड़े अरब डॉलर में)

ईरान हमारा तीसरा बड़ा निर्यातक

देश                 आयात (2019)
ईराक                4.22
सऊदी अरब        3.68
ईरान                 2.32
वेनेजुएला            1.68
यूएई                  1.65
नाइजीरिया           1.46
(आंकड़े करोड़ टन में)
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