भारत को व्यापार व निवेश के लिए अपने द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ाने की जरूरत है, क्योंकि दुनिया में उथल-पुथल मची हुई है और द्विपक्षीय रिश्ते ही एकमात्र सबसे फायदेमंद जरिया प्रतीत होते हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को यह बात कही। वित्त मंत्री ने यहां ‘बीएस मंथन’ में कहा कि यह बहुत ही दिलचस्प लेकिन चुनौतीपूर्ण समय है और सरकार देश को आगे बढ़ाने और वैश्विक वृद्धि का इंजन बनाने के लिए सभी प्रयास कर रही है।
वित्त मंत्री ने कहा, "द्विपक्षीय संबंध अब एजेंडा में शीर्ष पर है... हमें कई देशों के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ाना है, न केवल व्यापार के लिए, न केवल निवेश के लिए, बल्कि रणनीतिक संबंधों के लिए भी। इसलिए बहुपक्षवाद... कुछ हद तक, मैं अब भी इसे "कुछ हद तक" कह रही हूं... लेकिन द्विपक्षीय संबंध ही एकमात्र फायदेमंद हैं जिसका आप इस्तेमाल कर सकते हैं।"
वित्त मंत्री ने कहा कि वैश्विक व्यापार आज पूरी तरह से बदल रहा है और "जिन शर्तों और संदर्भों के साथ हम सभी व्यापार करते थे, विश्व व्यापार संगठन में ऐसा किसी प्रकार का सहारा (संस्था) अब उपलब्ध नहीं है।" उन्होंने कहा कि कोई सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र (एमएफएन) की अवधारणा नहीं है। प्रत्येक देश चाहता है कि उसके साथ विशेष व्यवहार किया जाए। उन्होंने कहा, "यदि विश्व व्यापार संगठन कमजोर हो रहा है या बहुपक्षीय संस्थाएं प्रभावी नहीं रही हैं... तो व्यापार के संदर्भ में द्विपक्षीय व्यवस्थाएं ही दिन-प्रतिदिन की जरूरत बन जाएंगी।" एक नई दुनिया की ओर बढ़ते कदम को देखते हुए, भारत ने ब्रिटेन सहित कई देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार वार्ता शुरू की है और अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते की योजना बना रहा है।
भारत 27 देशों के समूह यूरोपीय संघ के साथ भी मुक्त व्यापार समझौते पर चर्चा कर रहा है। उन्होंने कहा कि नई वैश्विक व्यवस्था में भारत को व्यापार, निवेश व रणनीतिक संबंधों को बढ़ावा देने के लिए अपने द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ाने की जरूरत है। सुधारों का जिक्र करते हुए सीतारमण ने कहा कि सरकार ऋण प्रबंधन और राजकोषीय विवेकशीलता बनाए रखने सहित विभिन्न क्षेत्रों में सुधार जारी रखेगी।