पीएम मोदी और शी जिनपिंग
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
99 अरब डॉलर के पार क्यों पहुंचा व्यापार घाटा?
कारोबार में भारी बढ़ोतरी के बावजूद भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बढ़ता व्यापार घाटा है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा बढ़कर 99.19 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो 2024-25 में 85 अरब डॉलर था। ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें तो यह घाटा 2019-20 में 53.56 अरब डॉलर, 2020-21 में 48.64 अरब डॉलर, 2021-22 में 44 अरब डॉलर, 2022-23 में 73.3 अरब डॉलर और 2023-24 में 83.2 अरब डॉलर दर्ज किया गया था।
वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, यह घाटा मुख्य रूप से कच्चे माल, मध्यवर्ती वस्तुओं और कैपिटल गुड्स के बड़े पैमाने पर आयात के कारण है। इनमें ऑटो घटकों, इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स, मोबाइल असेंबली, मशीनरी और एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (एपीआई) का आयात शामिल है, जिनका इस्तेमाल भारत में तैयार माल बनाने और फिर उन्हें दुनिया भर में निर्यात करने के लिए किया जाता है।
चीनी सामान पर भारतीय उद्योगों की निर्भरता कितनी गहरी है?
वर्ष 2025 में चीन से भारत आने वाले कुल आयात का 98.5 प्रतिशत हिस्सा औद्योगिक उत्पादों का रहा है, जबकि कृषि, ईंधन, रत्न एवं आभूषण की हिस्सेदारी मिलकर भी 1.5 प्रतिशत से कम है। भारत के कुल चीनी आयात का लगभग 66 प्रतिशत हिस्सा- जिसका मूल्य 82.6 अरब डॉलर है- चार प्रमुख क्षेत्रों में केंद्रित है:
- इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र: भारत अपने कुल इलेक्ट्रॉनिक्स आयात का 43 प्रतिशत हिस्सा चीन से मंगवाता है।
- मशीनरी एवं कंप्यूटर: भारत के कुल मशीनरी और कंप्यूटर आयात में चीन का योगदान 40 प्रतिशत दर्ज किया गया है।
- ऑर्गेनिक केमिकल्स: इस श्रेणी में चीन की हिस्सेदारी 44 प्रतिशत है।
थिंक टैंक जीटीआरआई के विश्लेषण के अनुसार, ये आयात केवल गैर-जरूरी सामान नहीं हैं, बल्कि ये भारत के विनिर्माण तंत्र के मुख्य इनपुट हैं। भारत उद्योग इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स, ईवी बैटरियों, सोलर मॉड्यूल, एपीआई और विशेषज्ञ रसायनों के लिए चीन से हो रही आपूर्ति पर अत्यधिक निर्भर हैं, जिन्हें बड़े पैमाने पर तुरंत बदलना कठिन है। नतीजतन, भारत द्वारा निर्यात बढ़ाने के प्रयासों के बावजूद उसकी सप्लाई चेन चीन से गहराई से जुड़ी हुई है।
पीएम मोदी और शी जिनपिंग
- फोटो : अमर उजाला
निवेश नियमों और ब्रिक्स मंच का क्या है आर्थिक महत्व?
यदि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफटीआई) की बात करें तो अप्रैल 2000 से मार्च 2026 के बीच भारत को चीन से कुल 2.51 अरब डॉलर का एफडीआई प्राप्त हुआ है। भारत सरकार ने मार्च में उन देशों के लिए एफडीआई नियमों में ढील दी थी जो भारत के साथ थल सीमा साझा नहीं करते हैं और जिनमें भूमि सीमा साझा करने वाले देशों के लाभांश धारकों की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से कम व गैर-नियंत्रण वाली है। हालांकि, ढील दिए गए ये नए एफडीआई नियम चीन, हांगकांग या भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले अन्य देशों में पंजीकृत संस्थाओं पर लागू नहीं होंगे।
फिलहाल भारत में ब्रिक्स का आयोजन हो रहा है। ब्रिक्स दुनिया की 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक शक्तिशाली समूह है, जो वैश्विक आबादी का लगभग 49.5 प्रतिशत, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 40 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार का लगभग 26 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करता है।
नई दिल्ली में आयोजित हो रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बातचीत पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं। दोनों देशों के व्यापारिक आंकड़े साफ दर्शाते हैं कि एक तरफ जहां दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 127.7 अरब डॉलर के नए स्तर को छू रहा है, वहीं 99.19 अरब डॉलर का विशाल व्यापार घाटा और घरेलू विनिर्माण की चीनी इनपुट्स पर निर्भरता भारत के लिए एक रणनीतिक व आर्थिक चुनौती बनी हुई है। आगामी बैठकों में व्यापार संतुलन और सप्लाई चेन की मजबूती जैसे मुद्दों पर क्या प्रगति होती है, इस पर उद्योग जगत की विशेष नजर रहेगी।