अमेरिका के बढ़ते दबाव के बावजूद भारत को अपने हितों के प्रति दृढ़ रहने की जरूरत है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) की रिपोर्ट में यह टिप्पणी की गई है। इसमें कहा गया कि भारत को अपने रास्ते पर बने रहना चाहिए और कृषि जैसे प्रमुख क्षेत्रों में समझौता करने से बचना चाहिए।
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अपरिवर्तनीय परिणाम की चेतावनी
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि दबाव में व्यापार समझौता करने से अपरिवर्तनीय परिणाम हो सकते हैं। खासकर तब जब ऐसे समझौते अमेरिकी राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव के बाद टिक न पाएं।
ट्रंप की धमकियां विश्वसनीयता खो रहीं
जीटीआरआई ने कहा कि ट्रंप की आक्रामक व्यापारिक धमकियां अब विश्वसनीयता खो रही हैं। तीन महीने से ज्यादा समय से जारी दबाव के बावजूद, केवल दो देश, यूनाइटेड किंगडम और वियतनामस अमेरिका की एकतरफा व्यापार शर्तों पर सहमत हुए हैं। जापान, दक्षिण कोरिया यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया सहित अन्य देशों ने इन शर्तों का विरोध किया है।
MASALA डील के झांसे में न आए
इसे जीटीआरआई ने 'MASALA डील' बताया है, जिसका मतलब है मुचुअली एग्रीड सेटेलमेंट्स अचीव्ड थ्रू लेवेलारज्ड आर्म ट्विस्टिंग, यानी दबाव डालकर आपसी समझौते हासिल करना। रिपोर्ट में कहा गया कि इन समझौतों के तहत आमतौर पर अन्य देशों को अमेरिका से पारस्परिक रियायतें लिए बिना टैरिफ में कटौती करनी होती है, अमेरिकी वस्तुओं की खरीद की गारंटी देनी होती है। साथ ही वाशिंगटन को भविष्य में अतिरिक्त टैरिफ लगाने की गुंजाइश भी छोड़नी होती है।
ट्रंप ने व्यापार वार्ता के बीच इन देशों पर लगाया टैरिफ
इन शर्तों को लागू करने में सीमित सफलता मिलने के कारण, ट्रम्प प्रशासन ने दंडात्मक उपाय अपनाए हैं। 7 जुलाई को, अमेरिका ने जापान और दक्षिण कोरिया से आयात पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की। कुछ ही दिनों बाद, 12 जुलाई को, यूएस ने यूरोपीय संघ और मेक्सिको से आयातित उत्पादों पर 30 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी, जबकि इन देशों के साथ बातचीत अभी भी जारी है।
भारत सहित 20 से ज्यादा देश दबाव का सामने कर रहें
जीटीआरआई रिपोर्ट ने भारत से आग्रह किया कि उसे समझना होगा कि वह अकेला देश नहीं है जो इस तरह के दबाव का सामना कर रहा है। अमेरिका इस समय 20 से ज्यादा देशों के साथ व्यापार वार्ता कर रहा है और 90 से ज्यादा देशों से रियायतें मांग रहा है। हालांकि, अधिकांश लोग इसका विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि ये मसाला सौदे राजनीति से प्रेरित हैं और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में कोई स्थायी निश्चितता प्रदान नहीं करते हैं।