धर्मेंद्र प्रधान ने इसी महीने के पहले हफ्ते में बताया था कि डीजल-पेट्रोल को जीएसटी के दायरे में लाने की दिशा में धीरे-धीरे आम सहमति बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि उनका यह भी कहना है कि राज्यों को कल्याण के सौ काम करने पड़ते हैं, इसलिए उन्हें राजस्व का कोई बढ़िया स्रोत तो चाहिए ही। लेकिन जब ये ईंधन जीएसटी में शामिल हो जाएंगे, तो जनता को राहत मिलेगी।
प्रधान का कहना है कि घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतें तय करने में केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं है। पिछले साल जून से ही तेल विपणन करने वाली सरकारी कंपनियां इसे दैनिक आधार पर तय करती हैं।
घरेलू बाजार में दोनों ईंधनों की कीमतें तय करने में अंतर्राष्ट्रीय बाजार की कीमतों को आधार बनाया जा रहा है। उनका कहना है कि पिछले कुछ दिनों से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम 70 डॉलर के ऊपर चला गया है, इसलिए कीमतें बढ़ रही हैं।
सोमवार को भी बढ़ी कीमतें
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सोमवार को पेट्रोल की कीमत एक दिन पहले के मुकाबले 10 पैसे बढ़ कर 74.50 रुपये प्रति लीटर पर थी, जो 14 सितंबर, 2013 के बाद का उच्च स्तर है। उस समय पेट्रोल की कीमत 76.06 रुपये पर पहुंच गई थी। इसी तरह, सोमवार को डीजल की कीमत भी 10 पैैसे प्रति लीटर चढ़ कर प्रति लीटर 65.75 रुपये पर पहुंची, जो अब तक का उच्चतम स्तर है।
पड़ोसी देशों में सस्ता है पेट्रोल-डीजल
सरकारी संगठन पीपीएसी के मुताबिक, एक अप्रैल, 2018 को पाकिस्तान में पेट्रोल और डीजल के प्रति लीटर दाम क्रमश: 47.04 रुपये और 54.33 रुपये, श्रीलंका में 48.94 एवं 39.74 रुपये, नेपाल में 64.78 और 52.20 रुपये और बंगलादेश में 68.08 और 51.45 रुपये थे।
यह है कीमतें बढ़ने का गणित
केन्द्र सरकार पेट्रोल पर प्रति लीटर 4.48 रुपये बेसिक एक्साइज ड्यूटी के रूप में, सात रुपये स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी के रूप में और आठ रुपये सेस के रूप में वसूलती है। इसी तरह डीजल पर प्रति लीटर 6.33 रुपये बेसिक एक्साइज ड्यूटी, एक रुपया स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी और आठ रुपये सेस के रूप में वसूलती है। जहां तक राज्यों की बात है, तो वे इन ईंधनों पर छह फीसदी से 39.95 फीसदी तक बिक्री कर वसूलती हैं। पेट्रोल पर सबसे कम बिक्री कर अंडमान एवं निकोबार में छह फीसदी का है, जबकि सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में 39.95 फीसदी का है।