मांग और रिफाइनिंग में मजबूती
तेल की खपत के मोर्चे पर भारत ने 2025 में चीन से तेज वृद्धि दर्ज की। अनुमान है कि अगले दशक में वैश्विक तेल मांग में बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा भारत से आएगा। रिफाइनिंग क्षमता में निरंतर विस्तार से भारत एक वैश्विक रिफाइनिंग हब के रूप में और मजबूत हुआ। वहीं प्राकृतिक गैस की खपत पाइपलाइन नेटवर्क और सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन के विस्तार से बढ़ी, जो संक्रमण ईंधन की रणनीति के अनुरूप है।
कीमतों में असामान्य शांति
2025 तेल बाजार के लिए असाधारण रूप से शांत साल रहा। ब्रेंट क्रूड अधिकांश समय 60-70 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रहा और दिसंबर के मध्य तक 59-60 डॉलर पर आ गया। युद्ध, प्रतिबंध, टैरिफ और शिपिंग बाधाओं के बावजूद कीमतों में तीव्र उछाल नहीं दिखा।
इस स्थिरता के पीछे अमेरिका, ब्राजील, गुयाना और कनाडा जैसे गैर-ओपेक देशों से बढ़ी आपूर्ति, ओपेक+ का अनुशासित उत्पादन प्रबंधन, चीन और यूरोप में कमजोर मांग और फ्लोटिंग स्टोरेज में वृद्धि जैसे कारक रहे।
भारत को राहत, सरकार को राजस्व
तेल कीमतों की इस स्थिरता ने भारत जैसे बड़े आयातकों को राहत दी। कोविड काल की तरह सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाया, लेकिन खुदरा कीमतें नहीं बढ़ाईं। तेल कीमतों में आई गिरावट से मिलने वाली राहत को टैक्स बढ़ोतरी से समायोजित कर सरकार ने अतिरिक्त राजस्व जुटाया, जो आयकर राहत के बाद महत्वपूर्ण माना गया।
आगे का रास्ता
जैसे-जैसे 2025 समाप्त हो रहा है, तेल और गैस उद्योग एक जटिल मोड़ पर खड़ा है। भू-राजनीतिक जोखिम, बदलती मांग, जलवायु दबाव और वैश्विक ऊर्जा कंपनियों की रणनीतिक दिशा- ये सभी संकेत देते हैं कि 2026 की ओर बढ़ते हुए यह सेक्टर संक्रमण के दौर में रहेगा, जहां 'तेल की वापसी' और 'ऊर्जा परिवर्तन' साथ-साथ चलेंगे।