अमेरिकी टैरिफ की चिंताएं
पोनमुडी आर कहते हैं बढ़ती वैश्विक मैक्रो अनिश्चितता, विशेषकर अमेरिका ट्रेड और टैरिफ डेवलपमेंट की वजह से निवेशक भारतीय बाजारों में सावधानी बरत रहे हैं। वीके विजयकुमार कहते हैं, राष्ट्रपति ट्रंप के आज के स्टेट ऑफ द यूनियन भाषण और उनके द्वारा दिए जानेवाले संदेश पर वैश्विक बाजार की पैनी नजर है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से टैरिफ बदलाव के मद्देनजर यूरोपीय संघ ने अमेरिका के साथ समझौते को स्थगति करना और ट्रंप द्वारा समझौतों से पीछे हटने वाले देशों को दी गई चेतावनी से संकेत मिलता है कि टैरिफ का यह नाटक अर्थव्यवस्थाओं और बाजारों पर और भी अधिक प्रभाव डालेगा। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप ने विदेशी देशों को धमकी दी है कि अगर वे अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन करते हैं, तो उन्हें अमेरिका में आयातित वस्तुओं पर और उच्च शुल्क का सामना करना पड़ सकता है।
अमेरिका-ईरान तनाव
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव जो काफी लंबे समय से चल रहा है, इसकी वजह से भी निवेशक सतर्क बने हुए हैं। क्योंकि विरोध प्रदर्शन अब पूरे ईरान में हो रहे हैं और सरकार की हिंसक प्रतिक्रियाओं में हजार लोग मारे जा रहे हैं। वहीं अमेरिका ने ईरान को सैन्य कार्रवाही करने की धमकी दी है। हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु वार्ता 26 फरवरी को होनी है।
कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से आर्थिक स्थितरता पर दबाव
एलारा कैपिटल का कहना है, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव जो कि पिछले कई महीनों से चल रहा है और परमाणु वार्ता से पहले ही कच्चे तेल की कीमतों में एक प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। यह 72 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गया है, जो छह महीने के उच्चतम स्तर के करीब है। विशेषज्ञ कहते हैं, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर बाजार पर देखा जा रहा है, क्योंकि भारत दुनिया का सबसे तेल आयात देश है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से देश यह मुद्रा को कमजोर कर सकता है।
मजबूत डॉलर
जानकार डॉलर की मजबूती को भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए नकारात्मक बताते हैं, क्योंकि इससे विदेशी पूंजी के आउटफ्लो का जोखिम बढ़ जाता है। फिलहाल सूचकांक में 0.20 प्रतिशत की वृद्धि हुई। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की घोषणा के बाद से विदेशी संस्थागत निवेशकों ने सेंटीमेंट में सुधार देखा गया है और वे भारतीय बाजार में खरीदारी कर रहे हैं, लेकिन शेयरों के मूल्यांकन अभी भी ऊंचे बने हुए हैं और कंपनियों की आय में ठोस सुधार देखने को नहीं मिल रहे हैं।