भारत की जेन-जी अब बाजार की बड़ी ताकत बन चुकी है। अभी माता-पिता की कमाई से बड़ी खरीदारी हो रही है, लेकिन आगे तस्वीर बदलने वाली है। 2035 तक इस पीढ़ी की खपत दोगुने से ज्यादा होने का अनुमान है, जिससे बाजार की दिशा पर उसका असर और बढ़ेगा। पढ़िए रिपोर्ट
देश की सबसे युवा पीढ़ी यानी जेन-जी अब सिर्फ सोशल मीडिया और डिजिटल ट्रेंड्स की ताकत नहीं, बल्कि भारत की सबसे बड़ी उपभोक्ता शक्ति बन चुकी है। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (बीसीजी) और स्नैप इंक की एक संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की करीब 37.7 करोड़ जेन-जी आबादी की देश के कुल खपत में हिस्सा 43% है, जिसकी कीमत करीब 860 अरब डॉलर है। दावा है कि 1997 से 2012 के बीच जन्मे जेन-जी का खर्च 2035 तक दोगुने से ज्यादा बढ़कर करीब 2 लाख करोड़ डॉलर हो सकता है। यह उस समय भारत के अनुमानित 3.9 लाख करोड़ डॉलर की कुल खपत का करीब आधा होगा। यानी आगामी दशक में बाजार की दिशा तय करने में जेन-जी की भूमिका निर्णायक होगी।
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अभी माता-पिता की कमाई, कल अपनी जेब
जेन-जी की आर्थिक ताकत का एक दिलचस्प पहलू यह है कि अभी इसकी बड़ी आबादी खुद कमाने वाली नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल इस पीढ़ी का केवल एक चौथाई हिस्सा काम कर रहा है। इसके बावजूद 860 अरब डॉलर के खर्च में करीब 660 अरब डॉलर 'इन्फ्लुएंस्ड स्पेंडिंग' है यानी ब्रांड, एप या उत्पाद का चुनाव जेन-जी करता है, लेकिन भुगतान अक्सर माता-पिता करते हैं। 2035 तक तस्वीर पूरी तरह बदलने की उम्मीद है। तब जेन-जी की 93% खपत सीधे उसकी अपनी कमाई से होने का अनुमान है।
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023.24 के अनुसार, शहरी परिवारों के कुल खर्च में गैर- खाद्य वस्तुओं की हिस्सेदारी 60.32% पहुंच गई है, जो 2011-12 में 57.38% थी।
यह बदलाव बताता है कि भारतीय उपभोक्ता अब सिर्फ जरूरी सामान पर नहीं, बल्कि लाइफस्टाइल, टेक्नोलॉजी, मनोरंजन, फैशन और अन्य गैर-खाद्य श्रेणियों पर भी ज्यादा खर्च कर रहा है।