रंगराजन ने 'नई मौद्रिक नीति रूपरेखा - इसका मतलब' शीर्षक से जारी एक पत्र में भारतीय रिजर्व बैंक की मुद्रास्फीति को काबू में रखने की सीमाओं के बारे में चर्चा की। रंगराजन ने कहा कि, 'मुद्रास्फीति का जो लक्ष्य दिया गया है, उसका दायरा होना चाहिए। साथ ही उसके समायोजन को लेकर समय सीमा होनी चाहिए और यह बहुत अल्प अवधि का नहीं होना चाहिए।'
साथ ही रंगराजन ने कहा कि, 'इन सबके बावजूद मौद्रिक नीति को उन बातों पर ध्यान दिए बिना काम करना चाहिए जो मुद्रास्फीति को बढ़ावा देने वाले हों। स्पष्ट तौर पर आपूर्ति संबंधी मसले में आपूर्ति प्रबंधन की जरूरत होती है और यह सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए।' देश में मुद्रास्फीति लक्ष्य का जो विचार अपनाया गया है, उससे कई संदेह और चिंताएं बढ़ी हैं।
मुद्रास्फीति चार फीसदी पर बनाए रखने की आवश्यकता
नई मौद्रिक नीति रूपरेखा के तहत रिर्जव बैंक को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति दो फीसदी घट-बढ़ के साथ चार फीसदी के स्तर पर बनाए रखने की आवश्यकता है।
दूसरे लक्ष्यों को नहीं करना चाहिए नजरअंदाज
आगे रंगराजन ने कहा कि, 'इस प्रकार एक तरह से यह लचीला लक्ष्य है। आरबीआई कानून में संशोधन कर मौद्रिक नीति समिति के गठन की व्यवस्था की गई जो मुद्रास्फीति लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए नीतिगत दर का निर्धारण करेगी।' मुद्रास्फीति को लक्ष्य के अनुसार रखने पर ध्यान देने का मबतल यह नहीं है कि वृद्धि और वित्तीय स्थिरता जैसे दूसरे लक्ष्यों को नजरअंदाज कर दिया जाए।
साल 2016 में किया था मौद्रिक नीति समिति का गठन
बता दें कि सरकार ने साल 2016 में नीतिगत निर्धारित करने के लिए मौद्रिक नीति समिति का गठन किया था। रिजर्व बैंक के गवर्नर की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय समिति मतदान के आधार पर निर्णय करती है।