निर्यातकों के शीर्ष संगठन फियो ने मंगलवार को भारतीय वस्तुओं पर अमेरिका की ओर से लगाए गए ऊंचे शुल्कों पर गंभीर चिंता जताई है। संगठन ने कहा है कि तिरुपुर, नोएडा और सूरत में कपड़ा और परिधान विनिर्माताओं ने अमेरिका के बढ़े हुए टैरिफ शुल्कों के कारण लागत प्रतिस्पर्धा बिगड़ने के बीच उत्पादन रोक दिया है। 27 अगस्त से भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी शुल्क बढ़कर 50 प्रतिशत हो जाएगा।
भारतीय निर्यात संगठन महासंघ (फियो) के अध्यक्ष एससी रल्हन ने कहा कि इस कदम से भारतीय वस्तुओं का अपने सबसे बड़े निर्यात बाजार में प्रवाह बुरी तरह बाधित होगा। उन्होंने इस घटनाक्रम को एक झटका बताया और कहा कि इससे अमेरिका को भारत के निर्यात पर गंभीर असर पड़ सकता है। उनके अनुसार भारत के अमेरिका जाने वाले लगभग 55 प्रतिशत निर्यात (47-48 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के) पर अब 30-35 प्रतिशत की कीमत का नुकसान हो रहा है। रल्हन ने कहा कि भारत पर बढ़े हुए टैरिफ का फायदा चीन, वियतनाम, कंबोडिया, फिलीपींस और अन्य दक्षिण-पूर्वी व दक्षिण एशियाई देशों को मिलेगा। भारत के उत्पादन इन देशों के उत्पादों की तुलना में अप्रतिस्पर्धी हो जाएंगे।
उन्होंने कहा, "फियो ने अमेरिकी सरकार द्वारा भारतीय मूल के सामानों पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने पर गंभीर चिंता व्यक्त की है - जिससे कई निर्यात श्रेणियों पर कुल शुल्क 50 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा, जो 27 अगस्त, 2025 से प्रभावी होगा।" उन्होंने आगे कहा कि "तिरुपुर, नोएडा और सूरत में कपड़ा और परिधान निर्माताओं ने लागत प्रतिस्पर्धा में गिरावट के कारण उत्पादन रोक दिया है।"
रल्हन ने कहा कि यह क्षेत्र वियतनाम और बांग्लादेश के कम लागत वाले प्रतिद्वंद्वियों के सामने अपनी जमीन खो रहा है। राल्हन ने कहा कि चमड़ा, झींगा, चीनी मिट्टी, रसायन, हस्तशिल्प और कालीन जैसे श्रम-प्रधान निर्यात क्षेत्रों को प्रतिस्पर्धात्मकता में तीव्र गिरावट का सामना करना पड़ेगा, विशेष रूप से यूरोपीय, दक्षिण-पूर्वी और मैक्सिकन उत्पादकों के मुकाबले। उन्होंने कहा, "इन क्षेत्रों में देरी, ऑर्डर रद्द होना और लागत लाभ का समाप्त होना बड़ी समस्या है।"
टैरिफ पर वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए संगठन ने कहा है कि तत्काल सरकारी सहायता की आवश्यकता है। इसमें कार्यशील पूंजी और तरलता को बनाए रखने के लिए ब्याज अनुदान योजनाओं और निर्यात ऋण सहायता को बढ़ावा देना शामिल है। इस क्षेत्र को वर्तमान में कम ऋण लागत और आसान ऋण उपलब्धता की आवश्यकता है। खासकर, एमएसएमई को, बैंकों और वित्तीय संस्थानों से सहयोग की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक से विशेष निर्देश की आवश्यकता है। रल्हन ने एक वर्ष की अवधि तक ऋणों के मूलधन और ब्याज के भुगतान पर रोक लगाने का भी आग्रह किया।