भारत पर अमेरिका द्वारा 27 अगस्त को और अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने के बाद कुल टैरिफ दरें 50 प्रतिशत हो गईं है। इससे निर्यात मुख्य कारोबार सबसे अधिक प्रभावित होने की संभावना है। इस विषय पर बाजार विशेषज्ञों की अपनी अलग-अलग राय है।
कुछ विशेषज्ञ एवं बाजार के दिग्गज इसे मेक इन इंडिया पहल और नए व्यापार समझौते के अवसर के रूप में देख रहे है। वे निवेशकों के विश्वास को मजबूत होने के साथ घरेलू और संस्थागत भागीदारी बढ़ने की बाते कहे रहे हैं। वहीं कुछ का कहना है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते के अभाव में भारत को न केवल निर्यात में कमजोरी का खतरा है। साथ ही इससे निवेश और रोजगार सृजन में भी कमी आने की आशंका है।
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) के एमडी और सीईओ सुदररामन राममूर्ति का कहना है कि भारत ने कोविड -19 से लेकर आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधानों तक, पिछले वैश्विक झटकों का सफलतापूर्वक सामना किया है। इसी दौरान भारत ने दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी मजबूती बनाए रखी है।
हाल ही में अमेरिका द्वारा टैरिफ में की गई बढ़ोतरी का न्यूनतम प्रभाव पड़ने कर उम्मीद है, क्योंकि ज्यादातर भारतीय व्यापार विविधीकरण और फार्मास्यूटिकल्स, स्मार्टफोन, इलेक्ट्रॉनिक्स और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे क्षेत्रों में प्रमुख छूटों द्वारा सुरक्षित किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर घरेलू मांग, मेक इन इंडिया पहल और नए व्यापार समझौते निवेशक का विश्वास मजबूत कर रहे हैं। जबकि बढ़ती घरेलू और संस्थागत भागीदारी भारत के पूंजी बाजारों को आकर्षक बनाने में मदद कर रही हैं। उनका कहना है कि देश के मजबूत बुनियादी ढांचे और नीतिगत उपाय यह सुनिश्चित करेंगे कि विदेशी संस्थागत निवेशक और एफडीआई प्रवाह स्थिर रहे। इससे टैरिफ में बदलाव का कोई लंबा प्रभाव सीमित रहेगा। यह सभी मजबूतियां मिलकर 2047 तक विकसित भारत की यात्रा को मजबूत करेंगी और एक वैश्विक आर्थिक नेता के रूप में इसकी स्थिति को मजबूत करेंगी।
जियोजित इंवेस्टमेंट के मुख्य निवेशक रणनीतिकार वीके विजयकुमार कहते है कि बाजार के सामने असली चुनौती उच्च मूल्यांकन और धीमी आय वृद्धि है। बाजार को समर्थन का मजबूत आधार घरेलू संस्थागत निवेशक है। विदेशी संस्थागत निवेशक द्वारा की जा रही बिकवाली को घरेलू संस्थागत निवेशक द्वारा की जा रही खरीदारी बेसअसर कर देगी। कुमार का मानना है कि बाजार अभी भी परेशानी बनी रह सकती है, क्योंकि ऐसी संभावना है कि एफआईआई बिकवाली में तेजी ला सकते हैं। इससे धारणा कमजोर होगी और घरेलू बाजार में गिरावट आएगी। हालांकि भारत की विकास की कहानी आकर्षक बनी हुई है, लेकिन बाजार निकट भविष्य की घटनाओं को कम आंकता है और तीन से चार साल बाद होने वाली घटानक्रमों को पूरी तरह से ध्यान में नहीं रखता है।
पीएल कैपिटल के सलाहकार प्रमुख विक्रम कासट कहते हैं कि भारत दुनिया की सबसे कठोर टैरिफ व्यवस्थाओं में से एक का सामना कर रहा है। अमेरिका को निर्यात पर भारत की प्रभावी दर बढ़कर 34 प्रतिशत हो गई है और चीन के बाद दूसरे अन्य देशों से 16 प्रतिशत अधिक है। भारत का अमेरिका को आईटी और व्यावसायिक सेवाओं का निर्यात वस्तुओं से तीन गुना अधिक है। यह सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 6 प्रतिशत है। हालांकि अभी तक इस मौके पार कोई असर नहीं पड़ा है, लेकिन सेवाओं के क्षेत्र में अमेरिका का कोई भी कदम भारत के विकास मॉडल के मूल को चोट पहुंचा सकता है। बावजूद इसके सरकार घरेलू कारोबार और निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए लगातार काम कर रही है।