देश में कर्ज का बोझ इस कदर बढ़ चुका है कि लाखों परिवारों के पास रोजमर्रा के जरूरी खर्चों के लिए भी पैसे नहीं बच रहे हैं। हाल ही में आए एक नए और चौंकाने वाले सर्वे ने देश के मध्यम वर्ग के वित्तीय संकट की पोल खोल कर रख दी है। इस सर्वे के अनुसार, कर्ज के दलदल में फंसे 60 प्रतिशत लोगों की मासिक ईएमआई उनकी कुल पारिवारिक आय के बराबर या उससे भी अधिक हो चुकी है। वहीं, 40 प्रतिशत कर्जदार ऐसे हैं जो एक लोन को चुकाने के लिए दूसरा नया लोन ले रहे हैं या क्रेडिट कार्ड का सहारा ले रहे हैं। यह स्थिति देश में एक बड़े और गहरे होते कर्ज संकट की तरफ इशारा कर रही है।
डेबिट रेजोल्यूशन प्लेटफॉर्म 'एक्सपर्ट पैनल' द्वारा जारी इस सर्वे रिपोर्ट से साफ होता है कि लोग अपनी मर्जी या फिजूलखर्ची के कारण नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरियों के चलते कर्ज के जाल में फंस रहे हैं। कर्ज का यह चक्रव्यूह तब और खतरनाक हो जाता है जब लोग पुरानी किस्त चुकाने के लिए नया कर्ज लेने लगते हैं। सर्वे के अनुसार, इस श्रेणी में आने वाले 40 प्रतिशत लोग कर्ज के ऐसे दुष्चक्र में फंस चुके हैं, जिससे बाहर निकलना उनके लिए लगातार मुश्किल होता जा रहा है।
आमतौर पर यह माना जाता है कि लोग महंगी गाड़ियां, छुट्टियां या ऐशो-आराम के लिए कर्ज लेते हैं, लेकिन यह सर्वे इस धारणा को पूरी तरह खारिज करता है। रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे ज्यादा 26% लोगों ने गंभीर बीमारी या मेडिकल इमरजेंसी के खर्चों को पूरा करने के लिए लोन लिया था। इसके बाद:
ये आंकड़े साफ करते हैं कि वित्तीय झटके लोगों को कर्ज की ओर धकेल रहे हैं, न कि अत्यधिक खर्च करने की आदत।
जब बात कर्ज न चुका पाने की आती है, तो इसके पीछे भी सबसे बड़ी वजहें आय में गिरावट और अचानक आए आर्थिक संकट हैं। सर्वे के मुताबिक, लगभग एक-तिहाई (करीब 33%) कर्जदारों ने किस्त न चुका पाने का मुख्य कारण नौकरी का जाना या सैलरी में भारी कटौती को बताया है। इसके अलावा:
वित्तीय संकट से जूझ रहे इन कर्जदारों की मुश्किलें बैंकों और रिकवरी एजेंटों के आक्रामक व्यवहार के कारण और ज्यादा बढ़ जाती हैं। सर्वे में शामिल 35% कर्जदारों ने बताया कि उन्हें किसी न किसी रूप में प्रताड़ना का सामना करना पड़ा है। वहीं, 17% लोगों ने बेहद गंभीर उत्पीड़न की शिकायत की है, जिसमें अभद्र कॉल्स, धमकियां और एजेंटों का अचानक घर धमकना शामिल है।
इस गंभीर संकट पर चिंता व्यक्त करते हुए एक्सपर्ट पैनल के डायरेक्टर अनुराग मेहरा ने कहा, "ये आंकड़े दिखाते हैं कि भारत में कर्ज का संकट अब सिर्फ मिस्ड ईएमआई तक सीमित नहीं रह गया है। यह लोगों के सम्मान, मानसिक शांति और कुछ मामलों में तो जीने की इच्छा खोने से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा बन चुका है।" उन्होंने स्पष्ट किया कि इनमें से अधिकांश लोग आदतन डिफॉल्टर नहीं हैं, बल्कि वे आम लोग हैं जिन्हें जीवन की विपरीत परिस्थितियों ने इस हाल में पहुंचा दिया है।
विशेषज्ञ टैक्स एवं इन्वेस्टमेंट एक्सपर्ट बलवंत जैने कहते हैं, एक कर्ज को चुकाने के लिए दूसरा कर्ज लेने को डेट ट्रेप कहा जाता है, जिसमें कर्ज लेने वाला व्यक्ति एक भंवर में फंस जाता है एक के बाद दूसरा कर्ज लेता है। ऐसी स्थिति भविष्य में न हो उसके लिए कर्ज लेते कुछ बातों का ध्यान रखने की जरूरत है। साथ ही परिवार में यदि पति और पत्नी दोनों की कमा रहे हैं, तो पहले से भविष्य के लिए एक इमरजेंसी फंड बनाने की जरूरत है। जो मेडिकल इमरजेंसी सहित कई तत्काल आवश्यकताओं को कम से कम छम महीने के लिए पूरा कर सकता है। जैन कहते है कर्ज लेते समय कुछ चीजों की जांच अवश्य करें। जैसे-
इस बड़े आर्थिक और सामाजिक संकट से उबरने का रास्ता क्या है? अनुराग मेहरा के अनुसार, बैंकों, नियामकों और नीति निर्माताओं को मिलकर एक ऐसी मजबूत और संवेदनशील कर्ज निपटान व्यवस्था तैयार करनी होगी, जो कर्जदारों को डराने-धमकाने से बचाए और साथ ही कानूनी रिकवरी की प्रक्रिया को भी सुचारू रूप से चलने दे। जब तक कर्जदारों को प्रताड़ना से सुरक्षा और कर्ज के पुनर्गठन का सम्मानजनक मौका नहीं मिलेगा, तब तक इस संकट का स्थायी समाधान ढूंढना मुश्किल होगा।