ऑनलाइन फॉर्मेसी कंपनियों का कारोबार इसलिए बढ़ गया, क्योंकि यहां पर लोगों 30 फीसदी से अधिक का डिस्काउंट मिलता है। इतना डिस्काउंट दवा की दुकानों पर नहीं मिलता है। दवा की दुकान पर लोगों को जीएसटी लागू होने से पहले अच्छा डिस्काउंट मिलता था, लेकिन जीएसटी में आने के बाद वो केवल 5 से 10 फीसदी का डिस्काउंट देते हैं।
हालांकि छूट का पैमाना भी अलग-अलग दवाइयों के लिए है। जबकि ऑनलाइन कंपनियों पर कुल बिल पर 30 फीसदी की छूट दी जाती है। लेकिन यहां पर ग्राहकों को कुछ तय राशि तक की दवा खरीदनी पड़ती हैं।
कंपनियों को हुआ है नुकसान
हालांकि इन सभी कंपनियों को पिछले दो सालों में करीब 40 से लेकर के 70 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है। ऐसा इसलिए क्योंकि इन कंपनियों को दवाइयों की घर तक डिलिवरी करने के लिए अच्छा खासा पैसा सप्लाई चेन को मजबूत करने में खर्च करना पड़ा है।
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25 फीसदी नकली दवाइयों की बिक्री
फिक्की की एक रिपोर्ट के अनुसार देश भर में 25 फीसदी से ज्यादा दवाइयां नकली बिकती हैं। इस पर फिलहाल किसी तरह की रोक नहीं लग पा रही है। हालांकि स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से काफी कड़े कानून नकली दवा की बिक्री पर रोक लगाने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन इनका असर न के बराबर है।
स्वास्थ्य मंत्रालय लेकर आया था ड्रॉफ्ट नियम
ऑनलाइन दवा कारोबार को नियमित करने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने सितंबर में नियमों को लेकर एक प्रस्ताव तैयार किया था। इन नियमों के मुताबिक कंपनियों को रजिस्ट्रेशन कराने के लिए 50 हजार रुपये देने होंगे और आईटी एक्ट 2000 के कानून का पालन भी करना होगा।
साथ ही मरीज की सभी जानकारी को गोपनीय रखना होगा। केवल राज्य अथवा केंद्र सरकार को इसकी जानकारी मांगने पर साझा की जा सकती है। साथ ही इन कंपनियों को सभी बिल का भी रिकॉर्ड रखना होगा। हालांकि इन नियमों को कानूनी अमली जामा अभी तक नहीं पहनाया गया है।