एसोचैम की कृषि मामलों की कमेटी के चेयरमैन नन्द किशोर अग्रवाल ने अमर उजाला से कहा कि देश की बड़ी आबादी को रोजगार उपलब्ध कराने का फॉर्मूला फ़ूड प्रोसेसिंग क्षेत्र में खोजा जा सकता है। उन्होंने कहा कि इसके सहारे न केवल सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार दिया जा सकता है, बल्कि उन्हें गावों में ही रोककर शहरों की बढ़ती समस्याओं को भी कम किया जा सकता है। एनएसएसओ के आंकड़ों के अनुसार 2022-23 में देश के कुल श्रमबल का 45.76 प्रतिशत (यानी देश के कुल काम करने वालों में लगभग आधे लोग) कृषि और इससे संबंधित क्षेत्रों में ही काम कर रहे थे। ऐसे में यदि इस क्षेत्र की ताकत को आधार बनाया जाए तो सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार दिया जा सकता है।
दस करोड़ नए रोजगार की आवश्यकता
वर्तमान संसद सत्र में पेश किए गए आर्थिक सर्वे के अनुसार भारत में बढ़ती अर्थव्यवस्था से तालमेल बिठाने के लिए देश में हर साल लगभग 78.5 लाख रोजगार अवसर पैदा करने होंगे। यह कार्य 2036 तक चलना चाहिए और इस दौरान लगभग दस करोड़ नए रोजगार पैदा करने की आवश्यकता होगी। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह क्षमता किसी एक क्षेत्र के सहारे नहीं छोड़ी जा सकती, लेकिन खाद्य प्रसंस्करण इसमें बड़ा योगदान कर सकता है।
खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र की क्षमता
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों की मानें तो संगठित क्षेत्र की नौकरियों में अकेले इस क्षेत्र की हिस्सेदारी 12.22 फीसदी है। इसमें असंगठित क्षेत्र की नौकरियों के साथ-साथ तकनीकी तौर पर दक्ष लोगों के लिए भी नौकरियों के बेहतर अवसर उपलब्ध होते हैं। नन्द किशोर अग्रवाल के अनुसार, भारत के नौकरी क्षेत्र में असंगठित कामगारों की संख्या बहुत ज्यादा होती है। विश्व आर्थिक मंच के मुताबिक आने वाले वर्षों में यह संख्या 45 करोड़ तक पहुंच सकती है। यदि इस वर्ग को मजबूत किया जाए तो यह भारतीय उत्पादों की खपत के लिए एक बड़ा उपभोक्ता वर्ग भी बन सकता है। यानी यह उत्पादन और खपत दोनों की दृष्टि से भारत को ताकत प्रदान कर सकता है।
बड़ा अवसर
खाद्य प्रसंस्करण और उद्योग मंत्रालय का अनुमान है कि शीत भंडार गृहों (कोल्ड स्टोरेज चेन) और फल-सब्जियों के समय से ट्रांसपोर्टेशन की उचित सुविधाएं न होने के कारण 25 से 30 प्रतिशत फल और सब्जी सप्लाई चेन में ही बर्बाद हो जाती है। कृषि खाद्य वस्तुओं का मूल्य भी काफी सस्ता होता है, जबकि जब इन्हें ही प्रसंस्कृत कर दिया जाए तो इनका मूल्य कई गुना बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए सीजन के समय टमाटर का मूल्य पांच-दस रुपये किलो हो जाता है, जबकि इसको प्रसंस्कृत कर टोमैटो सॉस बनाकर इसी वस्तु को 150-200 रुपये प्रति किलो तक की दर से बेचा जा रहा है। रेडी टू ईट सब्जियों का मूल्य दस गुना से ज्यादा तक बढ़ जाता है।
संभावनाएं
राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमिता और प्रबंधन संस्थान (एनआईएफटीईएम) के अनुसार भारतीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के सालाना 11 फीसदी की दर से बढ़ने की उम्मीद है। साल 2025 तक यह उद्योग 480 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा। उपभोक्ताओं की बदलती प्राथमिकताएं, शहरीकरण और खर्च योग्य आय में वृद्धि से इस उद्योग को विकास के नए पंख लग रहे हैं।
देश के लिए अवसर
इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन (आईबीईएफ) की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय खाद्य प्रसंस्करण बाजार का आकार 2022 में 307.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, जिसके 2028 तक 547.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। यह सालाना 9.5 फीसदी की दर (सीएजीआर) से बढ़ेगा। इसके अलावा, शहरी और ग्रामीण बाजारों के बीच उपभोग का अंतर भी कम हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में इससे जुड़े प्रोडक्टों में 5.8 फीसदी की सराहनीय वृद्धि देखी गई है, जो शहरी विकास दर 6.8 फीसदी के करीब पहुंच गई है। चूंकि बढ़ते शहरीकरण में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का प्रचलन लगातार तेज हो रहा है, इस क्षेत्र का वैश्विक स्तर पर लगातार विकास हो रहा है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए।