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China: चीन में खुलेंगे विदेशी अस्पताल, भारतीय कॉरपोरेट स्वास्थ्य क्षेत्र निवेश को तैयार, चुनौतियां अपार

Mon, 09 Sep 2024 08:37 PM IST
बशु जैन वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग

सार

चीन ने 2014 में भी इस तरह की घोषणा की थी। इसमें कुछ भारतीय कॉरपोरेट अस्पतालों में दिलचस्पी दिखाई थी। इसके बाद देश के शीर्ष कॉरपोरेट अस्पतालों के स्वास्थ्य पेशेवरों ने चीन का दौरा किया था और अपने नेटवर्क को चीन तक विस्तारित करने में रुचि व्यक्त दिखाई थी, लेकिन आगे कुछ नहीं हो सका।
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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग - फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
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अब चीन के भी कुछ शहरों में विदेशी अस्पताल खोलने की तैयारी है। चीन सरकार के एक दस्तावेज के मुताबिक विदेशी निवेश से यह अस्पताल बीजिंग, तियानजिन, शंघाई, नानजिंग, सूज़ौ, फ़ूज़ौ, गुआंगज़ौ, शेन्ज़ेन और पूरे हैनान द्वीप में खोलने की अनुमति दी जाएगी। चीन के इस कदम के बाद भारतीय सका कॉरपोरेट स्वास्थ्य क्षेत्र में उत्साह है। कई कॉरपोरेट घराने यहां निवेश करने के लिए तैयार हैं। लेकिन विशेषज्ञ बताते हैं कि भारतीय और विदेशी कॉरपोरेट को चीन में निवेश में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। 

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चीन के वाणिज्य मंत्रालय, राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग और राष्ट्रीय चिकित्सा उत्पाद प्रशासन ने एक संयुक्त दस्तावेज में कहा कि अस्पतालों की स्थापना के लिए शर्तों, आवश्यकताओं और प्रक्रियाओं के बारे में बाद में घोषणा की जाएगी। चीन के पायलट मुक्त व्यापार क्षेत्र बीजिंग, शंघाई और ग्वांगडोंग और मुक्त व्यापार बंदरगाह हैनान में विदेशी उद्यमों को मानव स्टेम सेल, जीन निदान और उपचार से संबंधित प्रौद्योगिकियों के विकास और अनुप्रयोग की अनुमति है। यहां स्वास्थ्य संबंधी उत्पादों का पंजीकरण, लॉन्च और उत्पादन किया जाता है। 

दस्तावेज में कहा गया है कि उद्यमों को चीन के कानून और नियमों का पालन करते हुए मानव आनुवंशिक संसाधन प्रबंधन, दवा क्लीनिकल परीक्षण, दवा पंजीकरण, उत्पादन और नैतिक समीक्षा से संबंधित आवश्यकताओं को पूरा करना हाेगा। उन्हें प्रबंधन प्रक्रियाओं का पालन करने के लिए भी कहा जाता है।
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चीन ने 2014 में भी इस तरह की घोषणा की थी। इसमें कुछ भारतीय कॉरपोरेट अस्पतालों में दिलचस्पी दिखाई थी। इसके बाद देश के शीर्ष कॉरपोरेट अस्पतालों के स्वास्थ्य पेशेवरों ने चीन का दौरा किया था और अपने नेटवर्क को चीन तक विस्तारित करने में रुचि व्यक्त दिखाई थी, लेकिन आगे कुछ नहीं हो सका। विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन में इस क्षेत्र में निजी कंपनियों को आमंत्रित करने से चिकित्सा संसाधनों की बाधा कम होगी। हालांकि भारतीय कॉरपोरेट अस्पतालों को चीन में उद्यम स्थापित करने में द्विपक्षीय तनाव के असर का सामना करना पड़ सकता है। 

चीन की घोषणा पर सिप्ला (चीन) फार्मास्यूटिकल्स के उपाध्यक्ष और क्षेत्रीय प्रमुख श्रीधर सुब्रमण्यम ने कहा कि यह सकारात्मक विकास है। उन्होंने कहा कि कई साल पहले शंघाई में यह प्रयोग किया गया था। बाद में इसे बदल दिया गया। अब इसे फिर से शुरू किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत में कई कॉरपोरेट अस्पताल हैं जो अपना वैश्विक विस्तार कर रहे हैं। इनमें फोर्टिस, अपोलो, मैक्स, नारायण हृदयालय समेत कई संस्थाएं शामिल हैं। इनके पास विश्व स्तरीय अस्पताल स्थापित करने और जेसीआई प्रमाणन प्राप्त करने में विशेषज्ञता है। 

उन्होंने कहा कि चीन में अस्पताल स्थापित करने में कुछ चुनौतियां भी हैं। क्योंकि चीनी स्वास्थ्य सेवा और अस्पताल का तंत्र और प्रबंधन विदेशों से बहुत अलग है। विदेशी ग्राहकों के लिए विदेशी अस्पताल बनाने का कोई मतलब नहीं हैं, क्योंकि वह बहुत छोटी संख्या है। विदेशी अस्पतालों का मुख्य लक्ष्य स्थानीय आबादी का हित पूरा करना होगा। विदेशों से अच्छी इलाज की तकनीक को लाकर स्थानीय परिस्थति, प्रतिपूर्ति और प्रबंधन के हिसाब से स्थापित करनी होगी। 

सुब्रमण्यम ने कहा कि किसी भी अस्पताल के लिए बुनियादी ढांचा, प्रबंधन और क्लीनिकल विशेषज्ञता काफी मायने रखती है। किसी क्षेत्र में खुद को स्थापित करने के लिए क्लीनिकल विशेषज्ञता स्थानीय होना जरूरी है और चीन में यह आसान नहीं है। क्योंकि अधिकांश चीनी डॉक्टर बड़े अस्पतालों में काम करते हैं। विदेशी संस्थाओं के लिए एक और चुनौती चीनी आनुवंशिक सामग्री तक पहुंच और प्रबंधन की है। साथ ही चीनी रोगी की जानकारी भी जरूरी है। हालांकि इसे खोलने की नीति अच्छी है, लेकिन क्या वास्तव में इसके परिणामस्वरूप स्वास्थ्य सेवा में बहुत अधिक विदेशी निवेश आएगा, यह देखने की जरूरत है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय फार्मा क्षेत्र ने हाल के सालों में सरकारी चीनी स्वास्थ्य क्षेत्र पर काफी प्रभाव डाला है। मगर चीन ने अभी तक भारतीय दवाओं के आयात को पूरी तरह से मंजूरी नहीं दी है। कुछ साल पहले एक ल्यूकेमिया रोगी की दुर्दशा पर बनी एक चीनी फिल्म ने भारतीय कैंसर दवाओं का आयात करने की जरूरत का मुद़्दा उठाया था। क्योंकि भारतीय कैंसर की दवाएं चीन और अन्य देशों की तुलना में बेहद सस्ती हैं। भारत भी द्विपक्षीय व्यापार में 100 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक के घाटे को दूर करने के लिए चीन पर कैंसर का इलाज करने वाली दवाओं को अनुमति देने के लिए दबाव डाल रहा है। 
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