भारतीय अर्थव्यवस्था 2022 में 3.5 लाख करोड़ डॉलर के पार पहुंच गई। अगले पांच वर्षों तक यह जी-20 समूह में सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था रहेगी। हालांकि, निर्णय प्रक्रिया में शामिल नौकरशाही से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) पर जोखिम है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने मंगलवार को शोध रिपोर्ट में दावा किया कि भारत की आर्थिक वृद्धि की रफ्तार को लेकर नजरिया आशावादी है। लेकिन, नौकरशाही का लेटलतीफी वाला रवैया प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के गंतव्य के तौर पर भारत के आकर्षण को कम कर सकता है। वह भी तब, जब इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे दूसरे विकासशील देशों से भारत प्रतिस्पर्धा कर रहा है।
मूडीज इन्वेस्टर सर्विस ने कहा कि नौकरशाही की ओर से लगाई जाने वाली अड़चनें भारतीय जीडीपी के बढ़ने की रफ्तार को धीमी कर सकती हैं। लाइसेंस लेने व कारोबार शुरू करने की अनुमति प्रक्रिया में नौकरशाही की धीमी रफ्तार परियोजनाओं की स्थापना के समय को बढ़ा सकती है। इससे न सिर्फ परियोजनाओं के पूरी होने में देरी होगी बल्कि उन पर होने वाले खर्च में भी बढ़ोतरी होगी। इसका विपरीत असर सरकारी राजस्व के साथ पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
फिर भी 2030 तक चीन से पीछे रहेगा भारत
मूडीज ने कहा, इस दशक के बाकी समय में विनिर्माण और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में मांग सालाना आधार पर 3-12 फीसदी बढ़ेगी। फिर भी भारत की क्षमता 2030 तक चीन से काफी पीछे ही रहेगी। अर्थव्यवस्था की मजबूत क्षमता के बावजूद एक जोखिम यह है कि सीमित आर्थिक उदारीकरण या धीमी नीति कार्यान्वयन की वजह से भारत के विनिर्माण और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में निवेश की गति धीमी हो सकती है। इसके अलावा, क्षेत्रीय व्यापार समझौतों को लेकर भारत के सीमित उदार रवैये का भी विदेशी निवेश आकर्षित करने पर असर पड़ेगा।
सुधारों को लेकर सरकार का प्रयास उत्साहजनक
मूडीज ने कहा, भ्रष्टाचार को कम करने, आर्थिक गतिविधियों को संगठित करने, कर संग्रह को बढ़ाने और प्रशासन को बेहतर एवं मजबूत करने के लिए भारत सरकार का जारी प्रयास उत्साहजनक हैं। हालांकि इन प्रयासों की प्रभावशीलता को लेकर जोखिम बढ़ रहे हैं।
शहरीकरण से आवास व कारों की बढ़ेगी मांग
शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की एक बड़ी युवा एवं शिक्षित श्रमशक्ति, छोटे परिवारों की बढ़ती संख्या और शहरीकरण की वजह से आवास, सीमेंट एवं नई कारों की मांग में बढ़ोतरी आएगी। इसके अलावा, ढांचागत क्षेत्र पर सरकारी खर्च बढ़ने से इस्पात व सीमेंट कारोबार एवं नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश में वृद्धि होगी।