वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले वर्ष के बजट में कर मुक्त आय की मुक्त आय की सीमा बढ़कर 12 लाख रुपये कर दी। इससे आम लोगों को काफी राहत मिली। यह बदलाव भारतीय टैक्स व्यवस्था के इतिहास में एक मील का पत्थर है। लेकिन इस राहत के महत्व को समझने के लिए हमें इतिहास के उन पन्नों को पलटना होगा, जब ज्यादा कमाई करना मानो गुनाह था और सरकार आपकी कमाई का लगभग पूरा हिस्सा टैक्स के रूप में वसूल लेती थी।
एक दौर ऐसा भी था जब देश में 'मैक्सिमम मार्जिनल रेट' इतना ऊंचा था कि कमाने वाले की जेब में नाममात्र की रकम बचती थी।
जब ₹100 की कमाई पर बचते थे सिर्फ ₹2.25
आज जब 12 लाख रुपये तक की आय टैक्स फ्री हो गई है, तो 1973-74 का वो दौर डरावना लगता है। उस समय भारत में आयकर की दरें अपने चरम पर थीं।
• 97.75% टैक्स का दौर: 1973-74 में आयकर वसूलने की अधिकतम दर 85 फीसदी कर दी गई थी। इस पर सरचार्ज मिलाकर यह दर 97.75 फीसदी तक पहुंच जाती थी।
• जेब हुई खाली: इसका मतलब यह था कि एक निश्चित सीमा (2 लाख रुपये) से ऊपर, हर 100 रुपये की कमाई में से 97.75 रुपये सरकार रख लेती थी और कमाने वाले की जेब में सिर्फ 2.25 रुपये ही बचते थे।
उस 'सोशलिस्ट दौर' की तुलना में आज की 12 लाख रुपये की टैक्स फ्री लिमिट करदाताओं के लिए किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है।
आजादी के समय सिर्फ ₹1500 थी लिमिट
भारतीय आयकर का सफर बेहद दिलचस्प रहा है। आजाद भारत का पहला बजट 16 नवंबर 1947 को पहले वित्त मंत्री आरके शनमुखम चेट्टी ने पेश किया था,। उस समय देश में केवल 1500 रुपये तक की आमदनी ही टैक्स फ्री थी,। 1947 के 1500 रुपये से लेकर आज 12 लाख रुपये तक का यह सफर देश की आर्थिक प्रगति और बदलती नीतियों का गवाह है।
जब बच्चों और शादी पर तय होता था टैक्स
आज की टैक्स व्यवस्था काफी सरल है, लेकिन इतिहास में सरकारों ने टैक्स के जरिए 'सोशल इंजीनियरिंग' के कई प्रयोग किए:
1. कुंवारों पर ज्यादा बोझ: 1955 में सरकार ने जनसंख्या बढ़ाने के मकसद से अनोखा नियम बनाया था। इसके तहत शादीशुदा लोगों के लिए 2000 रुपये तक की आमदनी टैक्स फ्री थी, जबकि अविवाहितों के लिए यह छूट सिर्फ 1000 रुपये थी।
2. बच्चों की संख्या पर छूट: 1958 में भारत दुनिया का इकलौता ऐसा देश बना, जिसने बच्चों की संख्या के आधार पर टैक्स तय किया। अगर कोई शादीशुदा है और बच्चे नहीं हैं, तो 3000 रुपये तक छूट थी। एक बच्चे पर यह छूट 3300 रुपये और दो बच्चों पर 3600 रुपये हो जाती थी।
1973-74 के 97.75% टैक्स के दौर से निकलकर आज हम उस मुकाम पर हैं, जहां 12 लाख रुपये तक की आय कर-मुक्त है। विभिन्न सरकारों द्वारा समय-समय पर किए गए बदलावों ने आम आदमी पर से टैक्स का बोझ कम करने में बड़ी भूमिका निभाई है,। यह नया बदलाव निश्चित रूप से मध्यम वर्ग की खर्च करने की क्षमता को बढ़ाएगा।