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Report: भारत में ब्लू-कॉलर कामगार महिलाएं झेल रहीं असमानता का दंश; कॅरिअर में आगे बढ़ना हुआ मुश्किल

Sat, 08 Mar 2025 05:15 AM IST
शिव शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई

सार

रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं को मुख्य रूप से टेली कॉलिंग और घरेलू काम जैसे निश्चिंत्ता वाली नौकरियों के दायरे में बांध दिया गया है। इसके उलट, फील्ड सेल्स, मार्केटिंग और बैक-ऑफिस जैसी नौकरियों के अवसर घट रहे हैं।
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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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भारत में ब्लू-कॉलर नौकरियों यानी शारीरिक श्रम वाले काम करने वाली महिलाओं को अब भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ये महिलाएं ज्यादातर कम कौशल वाले, कम वेतन वाली और अस्थिर नौकरियों में काम कर रही हैं। इससे उनके करियर में आगे बढ़ना मुश्किल हो रहा है। यह खुलासा टेक्नोलॉजी आधारित ब्लू-कॉलर हायरिंग प्लेटफॉर्म वर्क इंडिया की शुक्रवार को जारी रिपोर्ट में हुआ है। महिला दिवस से एक दिन पहले आई यह रिपोर्ट चौकाने वाली हैं।

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वर्क इंडिया के सीईओ निलेश डुंगरवाल कहते हैं कि यह रिपोर्ट 2022 से 2024 के बीच प्लेटफॉर्म पर आए 11.46 लाख से अधिक नौकरी विज्ञापनों और आवेदनों के विश्लेषण पर आधारित है। हालांकि कुछ सुधार हुए हैं, लेकिन हमारे आंकड़े साफ दिखाते हैं कि ब्लू-कॉलर नौकरियों में महिलाओं के करियर में बढ़ने की राह में अब भी कई रुकावटें हैं। वर्क इंडिया लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहा है ताकि हर व्यक्ति, चाहे वह पुरुष हो या महिला, अपने लिए एक अच्छा रोजगार पा सके।

टेली कॉलिंग और घरेलू काम की नौकरियों में बंध कर रह गईं
रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं को मुख्य रूप से टेली कॉलिंग और घरेलू काम जैसे निश्चिंत्ता वाली नौकरियों के दायरे में बांध दिया गया है। इसके उलट, फील्ड सेल्स, मार्केटिंग और बैक-ऑफिस जैसी नौकरियों के अवसर घट रहे हैं। भारत में महिलाओं के लिए कुल नौकरी के विज्ञापन 2023 में केवल 0.4 फीसदी बढ़े थे। लेकिन 2024 में इन जॉब पोस्टिंग में 5.3 फीसदी की अच्छी खासी गिरावट दर्ज की गई। वर्क इंडिया की यह रिपोर्ट कहती हैं कि यह सिर्फ एक आकस्मिक गिरावट नहीं है, बल्कि यह ब्लू-कॉलर नौकरियों में लैंगिक असमानता की एक गंभीर परेशानी की तरफ इशारा करती। अब भी ज्यादातर महिलाएं कम वेतन, कम कौशल और अस्थिर नौकरियों में काम कर रही हैं।
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महिलाओं के लिए बैक-ऑफिस नौकरियों में आई 30 फीसदी की गिरावट
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कुछ क्षेत्रों में महिलाओं के लिए नौकरियों के अवसर बढ़े हैं। उदाहरण के लिए, महिलाओं के लिए टेली कॉलिंग की नौकरियों में 2023 में 10.3 फीसदी की तो 2024 में भी यह 8 फीसदी की दर से बढ़ रही है। इसी तरह, मेड (घरेलू काम) से जुड़ी नौकरियों में 2023 से 2024 के बीच 99.8 फीसदी की भारी बढ़ोतरी हुई। दूसरी तरफ, महिलाओं के लिए बैक-ऑफिस की नौकरियों में 2023 से 2024 के बीच 30 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। रिपोर्ट में बताया गया है कि ऑफिस चपरासी की नौकरियों के विज्ञापन भी 64.1 फीसदी तक घट गए।

2023-24 में 8.9 करोड़ शहरी भारतीय महिलाएं श्रम बाजार से रहीं बाहर
अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर भारतीय शहरी महिलाओं पर आई यह रिपोर्ट हैरान कर देने वाली है। इसके मुताबिक, 2023-24 में 8.9 करोड़ शहरी महिलाएं श्रम बाजार का हिस्सा नहीं थीं और यह हाल तब रहा जब बीते छह साल में महिला रोजगार में 10 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। यह खुलासा भारत लैंगिक रोजगार विरोधाभास शीर्षक से जारी चेन्नई के ग्रेट लेक्स इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट की रिपोर्ट में हुआ है। यह शहरी भारत में महिला बेरोजगारी के उभरते परिदृश्य पर भी नजर डालती है। यह रिपोर्ट बताती है कि शिक्षित महिलाओं की प्रतिभा का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा। इसके साथ ही यह कार्यस्थल पर लैंगिक विविधता की वजह से पैदा होने वाले खतरों और चुनौतियों के लिए आगाह करती है। यह रिपोर्ट आवधिक श्रम सर्वेक्षण (पीएलएफएस), राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) और समय उपयोग सर्वेक्षण (टीयूएस) जैसे सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षणों जैसे आंकड़ों पर आधारित है।

नहीं हो रहा 1.9 करोड़ स्नातक शिक्षित शहरी महिलाओं की प्रतिभा का इस्तेमाल
रिपोर्ट बताती है कि भारत 1.9 करोड़ स्नातक शिक्षित शहरी महिलाओं की प्रतिभा का इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। इसकी वजह या निजी फैसले या फिर सामाजिक बाधाएं हैं। इसका मतलब यह है कि शिक्षा पर किया गया बड़ा निवेश बेकार जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, परिवार की देखभाल, लचीले कार्य विकल्पों की कमी और आवाजाही की मुश्किलों जैसी समस्याएं कई शिक्षित महिलाओं को काम करने से रोकती हैं। हालांकि, शहरी क्षेत्रों में 20-24 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी दर पुरुषों (10 फीसदी) महिलाओं (7.5 फीसदी) की तुलना में अधिक है। यह भी चिंता की बात है।

शिक्षित दंपतियों में लैंगिक असमानता का बोलबाला
रिपोर्ट में यह भी देखा गया कि उच्च शिक्षितपरिवारों में लैंगिक असमानता का बोलबाला है। यहां तक कि दोहरी आमदनी वाले, उच्च शिक्षित जोड़ों के बीच भी लैंगिक असमानताएं बहुत अधिक हैं। ऐसे परिवारों में पति-पत्नी की शैक्षिक योग्यता एक समान होने पर भी 62 फीसदी मामलों में पति की आमदनी पत्नी से अधिक होती है। ग्रेट लेक्स इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, चेन्नई के डीन सुरेश रमणाथन ने चेतावनी दी कि अच्छी नौकरियों की कमी से कार्यस्थल पर लैंगिक विविधता का विरोध बढ़ सकता है। यदि अधिक महिलाएं कार्यबल में शामिल होती हैं लेकिन पुरुषों की बेरोजगारी बनी रहती है, तो समाज महिलाओं के काम करने पर एतराज जता सकता है, क्योंकि परंपरागत रूप से पुरुषों को परिवार का मुख्य कमाने वाला माना जाता है।

कामकाजी महिलाओं को घरेलू हिंसा का अधिक खतरा
रिपोर्ट में एक और परेशान करने वाली बात सामने आई है। शहरी भारत में नौकरी न करने वाली महिलाओं के मुकाबले कामकाजी महिलाओं को अपने पति से घरेलू हिंसा का अधिक खतरा होता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कामकाजी महिलाओं में नौकरी न करने वाली महिलाओं (23.5 फीसदी) के मुकाबले वैवाहिक हिंसा को सही ठहराने की अधिक संभावना (32 फीसदी) होती हैं। इसकी वजह सामाजिक दबाव और अपराधबोध हो सकता है। यह दिखाता है कि घर और कार्यस्थल दोनों में लैंगिक सोच में गहरा बदलाव जरूरी है।

अभी भी 41 फीसदी घरों में घर का सारा काम महिलाओं के जिम्मे
इसके अलावा, रिपोर्ट बताती है कि महिलाएं अब भी घरेलू कामकाज की मुख्य जिम्मेदारी उठाती हैं। 41 फीसदी घरों में पत्नियां पूरी तरह से घर का काम संभालती हैं, जबकि महज 2 फीसदी पतियों पर यह जिम्मेदारी होती है। शहरी कामकाजी मांओं के लिए नौकरी और बच्चों की देखभाल में संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, घर से काम करने वाली (वर्क फ्रॉम होम) 86 फीसदी कामकाजी मां अपने काम के दौरान भी बच्चों की देखभाल में रोजाना तीन घंटे तक का वक्त देती हैं, लेकिन महज 44 फीसदी को ही पर्याप्त सहयोग मिलता है। यह दिखाता है कि कामकाजी मांओं को सहयोग देने के लिए बेहतर कार्यस्थल नीतियों की सख्त जरूरत है।

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