देश के कुल व्यापार के 2033 तक 6.4 फीसदी की सालाना चक्रवृद्धि वार्षिक दर (सीएजीआर) से बढ़कर 1.8 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (बीसीजी) की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस उछाल को बढ़ावा देने वाला एक प्रमुख कारक चीन से परे आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने की चाहत रखने वाली कंपनियों के लिए उत्पादन केंद्र के रूप में भारत की बढ़ती ताकत है।
रिपोर्ट के मुताबिक, घरेलू स्तर पर विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए सरकार के पर्याप्त प्रोत्साहन, कम लागत वाले विशाल कार्यबल एवं बुनियादी ढांचे में तेजी से सुधार भारत की स्थिति को और मजबूत कर रहे हैं। परिणामस्वरूप, विदेशी निवेश और व्यापार सहयोग के लिए भारत दुनिया के लिए पसंदीदा गंतव्य बनता जा रहा है। भारत की व्यापार वृद्धि भौगोलिक दृष्टि के लिहाज से काफी विविध होगी। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि अमेरिका के साथ भारत का व्यापार अगले दशक में दोगुना से अधिक होने का अनुमान है और अगले आठ साल में यानी 2033 तक 116 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा।
यूरोपीय संघ, आसियान, अफ्रीका से 80 फीसदी बढ़ेगा कारोबार
रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोपीय संघ, आसियान और अफ्रीका के साथ भारत के व्यापार में करीब 80 फीसदी बढ़त की उम्मीद है। विशेष रूप से जापान और मर्कोसुर देशों के साथ भारत का व्यापार लगभग दोगुना होने का अनुमान है। इसके अलावा, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया के साथ व्यापार तीन गुना से अधिक होने का अनुमान है।
वृद्धि में आईटी, फार्मा, विनिर्माण क्षेत्र की होगी महत्वपूर्ण भूमिका
भारत, तुरि्कये और अफ्रीका के साथ यूरोप के व्यापार में तेजी आने से वैश्विक आपूर्ति शृंखला में देश की भूमिका मजबूत होगी। यूरोपीय संघ के साथ भारत के व्यापार वृद्धि में सूचना प्रौद्योगिकी, फार्मास्युटिकल और विनिर्माण क्षेत्र प्रमुख योगदानकर्ता होंगे। भारत संवेदनशील क्षेत्रों में चीनी निवेश को लेकर सतर्क होता जा रहा है।
पश्चिमी देशों के साथ मजबूत स्थिति
बीसीजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा, पश्चिमी देशों के साथ भारत की व्यापार वृद्धि मजबूत बनी हुई है, जबकि चीन का व्यापार धीमा होने की आशंका है। इसके जवाब में चीन भारत, रूस, आसियान, अफ्रीका और मर्कोसुर देशों के साथ अपने आर्थिक संबंध मजबूत कर रहा है। हालांकि, विभिन्न उद्योगों में अतिरिक्त क्षमता से प्रेरित चीन के विशाल व्यापार सरप्लस को न केवल अमेरिका और यूरोपीय संघ से बल्कि भारत और अन्य व्यापार भागीदारों से भी विरोध का सामना करना पड़ सकता है।