भारत की पहली तिमाही की 7.8 प्रतिशत जीडीपी विकास दर को लेकर जारी बहस अब तेज हो गई है। केंद्रीय वाणिज्य व उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने विपक्षी दलों और पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के दावों पर कड़ा पलटवार करते हुए उन्हें देश को गुमराह करने वाला बताया है। गोयल ने इस बात पर जोर दिया कि वैश्विक उथल-पुथल के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था 'रेगिस्तान में नखलिस्तान' (oasis in the desert) की तरह चमक रही है और यह दुनिया की सबसे तेज बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बनी हुई है। उन्होंने आलोचकों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि वे पुराने और नए आधार वर्ष के आंकड़ों की गलत तुलना कर रहे हैं।
वाणिज्य मंत्री ने उन आलोचकों और विपक्षी नेताओं पर निशाना साधा जो लगातार 7.8 प्रतिशत की वास्तविक विकास दर पर सवाल उठा रहे थे और नौकरियों की उपलब्धता को लेकर सरकार को घेर रहे थे। गोयल ने तंज कसते हुए कहा कि नकारात्मक मानसिकता वाले ये लोग इस बात को पचा नहीं पा रहे हैं कि देश में केवल यही बेरोजगार बचे हैं और उनके पास टीवी पैनलों पर बैठकर मनगढ़ंत तर्क गढ़ने के अलावा कोई काम नहीं रह गया है। रोजगार के मुद्दे पर जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि देश में कामगारों की मांग बहुत मजबूत है, खासकर टेक्सटाइल सेक्टर में। उन्होंने उद्योग की मांग का हवाला देते हुए चुनौती दी, "मुझे तिरुपुर में 1,00,000 लोग भेजें, हम उन्हें तुरंत नौकरी प्रदान करेंगे"। गोयल ने स्पष्ट किया कि राजनेता, मंत्री या सांसद इन आंकड़ों को खुद तैयार नहीं करते, बल्कि यह एक पारदर्शी और स्थापित व्यवस्था के तहत दर्ज होते हैं। उन्होंने विपक्ष को सचेत किया कि ऐसी नकारात्मक सोच के साथ वे स्वयं को ही छोटा साबित कर रहे हैं।
भारत की पहली तिमाही की आर्थिक विकास दर को लेकर इस समय देश के नीति-निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों के बीच एक बड़ी बहस छिड़ गई है। सरकार ने उस दावे को पूरी तरह से सिरे से खारिज कर दिया है जिसमें कहा गया था कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी विकास दर 7.8 प्रतिशत नहीं, बल्कि केवल 2.6 प्रतिशत के करीब थी। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) ने साफ किया है कि देश की 7.8 प्रतिशत की मजबूत आर्थिक वृद्धि पूरी तरह से वास्तविक उत्पादन आंकड़ों पर आधारित है और इसे कम करके आंकने के प्रयास सेब की तुलना संतरे से करने जैसा हैं।
इस पूरे विवाद की शुरुआत पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के उस बयान से हुई, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि यदि पिछले साल की पहली तिमाही की जीडीपी को करीब 86 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 80 लाख करोड़ रुपये नहीं किया गया होता, तो मौजूदा कीमतों पर देश की जीडीपी विकास दर महज 2.6 प्रतिशत के आसपास होती। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले साल के आंकड़ों को जानबूझकर संकुचित किया गया है ताकि चालू वर्ष की विकास दर को कृत्रिम रूप से बढ़ाया जा सके।
सांख्यिकी सचिव सौरभ गर्ग ने इस दलील को पूरी तरह दोषपूर्ण बताते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने साफ-साफ कहा कि आलोचक दो ऐसी चीजों की तुलना कर रहे हैं जिनका आपस में कोई मेल नहीं है:
मंत्रालय ने साफ किया कि डेटा में बदलाव किसी हेरफेर का हिस्सा नहीं, बल्कि सामान्य संशोधन चक्र का हिस्सा है। नए आधार वर्ष (2022-23) के तहत, पिछले साल की पहली तिमाही की जीडीपी शुरुआत में 80.32 लाख करोड़ रुपये आंकी गई थी, जिसे बाद में नए औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) और उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) के आधार पर संशोधित कर क्रमशः 80.44 लाख करोड़ रुपये और अंततः 80 लाख करोड़ रुपये किया गया। इसलिए यह कहना गलत है कि आंकड़ों को कृत्रिम रूप से घटाया गया।
आलोचकों ने इस बात पर भी सवाल उठाए थे कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में वास्तविक वृद्धि (9.2%) नॉमिनल वृद्धि (7.7%) से अधिक कैसे हो सकती है। मंत्रालय ने समझाया कि ऐसा डबल डिफ्लेश' पद्धति के कारण हुआ है। जब कच्चे माल (इन्पुट) की कीमतें तैयार उत्पादों (आउटपुट) की तुलना में तेजी से बढ़ती हैं (जैसे कपड़ा, धातु और प्लास्टिक सेक्टर में हुआ), तो नॉमिनल ग्रॉस वैल्यू ऐडेड (जीवीए) वास्तविक जीवीए की तुलना में धीमा हो जाता है। इसके चलते ही वहां -1.5% का निगेटिव डिफ्लेटर दिखाई दे रहा है, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि फैक्टरी-गेट पर उत्पाद सस्ते हुए हैं।
खनन क्षेत्र में भी ऐसा ही विरोधाभास दिखा, जहां वास्तविक माइनिंग जीवीए में 2.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, लेकिन नॉमिनल जीवीए में 22.3 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई। इसका कारण यह था कि अप्रैल से जून के दौरान कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में 72.2 प्रतिशत तक का उछाल आया था। वहीं कृषि क्षेत्र में स्थिति अलग थी, जहां उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) में 5 प्रतिशत की बढ़त के कारण कृषि जीवीए में 3.9 प्रतिशत की सकारात्मक मुद्रास्फीति दर्ज की गई।