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कांचीपुरम सिल्क और कोल्हापुरी चप्पल सहित 326 उत्पादों को जीआई टैग

Tue, 23 Oct 2018 04:50 PM IST
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला
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नागपुरी संतरा
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कांचीपुरम सिल्क साड़ी, अल्फांसो आम, नागपुरी संतरा और कोल्हापुरी चप्पल जैसे 326 उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (जीआई टैग) के रूप में पंजीकृत किया गया है। औद्योगिक नीति और पदोन्नति विभाग (डीआईपीपी) की एक शाखा आईपीआर प्रचार और प्रबंधन (सीआईपीएएम) ने ट्वीट कर यह जानकरी दी। ट्वीट में बताया गया है कि विभिन्न श्रेणियों में 326 भौगोलिक संकेतकों के पंजीकरण के साथ जीआई रजिस्ट्री ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। इसमें 14 विदेशी जीआई भी शामिल हैं। देश में पहला पहला जीआई टैग दार्जिलिंग चाय को 2004-05 में दिया गया था।

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इन उत्पादों को मिल चुका है जीआई टैग

इससे पहले बासमती चावल, दार्जिलिंग चाय, चंदेरी वस्त्र, मैसूर सिल्क, कुल्लू शॉल, कांगड़ा चाय, तंजावुर चित्रकला, इलाहाबाद सुरखा, फर्रूखाबाद प्रिंट्स, लखनऊ की जरदोजी और कश्मीरी अखरोट की लकड़ी से बने नक्काशी को जीआई टैग मिल चुका है। 

क्या है जीआई टैग

जीआई टैग मुख्य रूप से कृषि, प्राकृतिक और निर्मित उत्पाद (हस्तशिल्प और औद्योगिक सामान) को दिया जाने वाला एक विशेष टैग है। यह विशेष गुणवत्ता और पहचान वाले उत्पाद को दिया जाता है, जो किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में उत्पन्न होता है।
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जीआई टैग से उत्पाद को कानूनी सुरक्षा

अगर किसी उत्पाद को एक बार जीआई टैग मिल जाता है तो कोई भी व्यक्ति या कंपनी उसी नाम से एक समान उत्पाद नहीं बेच सकती है। ऐसा करने पर जीआई टैग धारक दूसरी कंपनी या व्यक्ति पर कानूनी कार्रवाई कर सकता है। यह टैग 10 वर्षों की अवधि के लिए मान्य है। यह समय-सीमा समाप्त होने के बाद इसे दोबारा नवीनीकृत किया जा सकता है। जीआई के पंजीकरण के अन्य लाभों में उस उत्पाद के लिए कानूनी सुरक्षा, दूसरों द्वारा अनधिकृत उपयोग के खिलाफ रोकथाम और निर्यात को बढ़ावा देना भी शामिल है।

देश में 2003 में हुआ था लागू
  
जीआई टैग को औद्योगिक संपत्ति के संरक्षण के लिए पेरिस कन्वेंशन के तहत बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपीआर) के एक घटक के रूप में शामिल किया गया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीआई का विनियमन विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधी पहलुओं पर समझौते के तहत किया जाता है। वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर यह कार्य वस्तुओं के भौगौलिक सूचक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम-1999 के तहत किया जाता है, जो 15 सितंबर, 2003 से लागू हुआ था।

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