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वैश्विक तनाव: ईरान पर अमेरिकी शिकंजे से भारत की बढ़ेगी मुश्किल, 100 डॉलर तक पहुंच सकता है कच्चा तेल

Thu, 27 Aug 2026 01:13 PM IST
द बोनस बिजनेस न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

मॉर्गन स्टेनली ने चौथी तिमाही के लिए ब्रेंट क्रूड का अनुमान बढ़ाकर 100 डॉलर प्रति बैरल किया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा, महंगा तेल, ऊंचा मालभाड़ा और कमजोर होता रुपया देश का संकट बढ़ा सकते हैं। रूसी तेल खरीदारों पर 100 फीसदी तक अमेरिकी टैरिफ लगाने वाले बिल से भारत के लिए कड़ी चुनौती सामने आ सकती है। आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं।
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़े गए ताजा आर्थिक युद्ध और कड़े प्रतिबंधों की घोषणा ने भारत सहित दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में भारत का ईरान के साथ सीधा व्यापार घटकर बेहद सीमित रह गया है, लेकिन इस भू-राजनीतिक तनाव का सबसे बड़ा झटका अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में आपूर्ति संकट और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के रूप में लगेगा। 
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वैश्विक ब्रोकरेज फर्म मॉर्गन स्टेनली ने अपनी ताजा रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि वैश्विक तेल बाजार में कच्चे तेल का स्टॉक तेजी से घट रहा है और मध्य पूर्व से सामान्य सप्लाई बहाल होने में 2027 तक का समय लग सकता है। इसके चलते ब्रोकरेज ने साल 2026 की चौथी तिमाही के लिए ब्रेंट क्रूड के अपने पूर्वानुमान को 75 डॉलर से बढ़ाकर सीधे 100 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है।

क्यों महंगा होगा कच्चा तेल? 
  • मॉर्गन स्टेनली के अनुसार, वैश्विक ऊर्जा बाजार उम्मीद से कहीं अधिक तेजी से सख्त हो रहा है। 13 जुलाई के बाद से समुद्र में जहाजों पर मौजूद तेल करीब 17 करोड़ बैरल घट चुका है, जो लगभग 47 लाख बैरल प्रतिदिन की गिरावट दर्शाता है। इसके अलावा चीन सहित कई देशों में तटवर्ती डिपो का स्टॉक भी तेजी से घटा है।
  • उधर, अमेरिकी स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व से अतिरिक्त तेल जारी करने की समयसीमा सितंबर के बाद खत्म हो रही है। रिफाइनिंग क्षमता की सीमाओं के चलते गैसोइल और ब्रेंट के बीच का क्रैक स्प्रेड रिकॉर्ड 75 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच चुका है (गैसोइल 175 डॉलर और ब्रेंट 92 डॉलर), जो भौतिक बाजार में कच्चे माल की भारी किल्लत की पुष्टि करता है।
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शेयर बाजारों के लिए खतरा 
मॉर्गन स्टेनली के मुख्य अमेरिकी इक्विटी रणनीतिकार माइकल विल्सन ने आगाह किया है कि कच्चे तेल की कीमतों में नया उछाल वैश्विक इक्विटी बाजारों के लिए सबसे बड़ा जोखिम साबित हो सकता है। यह बॉन्ड यील्ड को ऊपर धकेलेगा और महंगाई को काबू करने के लिए केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरों में कटौती टालने पर मजबूर करेगा।

भारत पर क्या होगा असर?
  • भारत अपनी कुल पेट्रोलियम जरूरतों का 85 फीसदी से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। यदि ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर के स्तर को छूता है, तो देश की अर्थव्यवस्था पर इसके गंभीर प्रभाव पड़ेंगे। 
  • ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, यदि ईरान संकट के चलते स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते तेल टैंकरों की आवाजाही बाधित होती है, तो भारत का तेल आयात बिल अनियंत्रित रूप से बढ़ जाएगा।
  • महंगा तेल सीधे तौर पर देश के व्यापार घाटे और चालू खाता घाटे को बढ़ाएगा। विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ने से अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में कमजोरी गहराएगी।
  • कच्चे तेल के महंगा होने से पेट्रोल, डीजल और एविएशन फ्यूल की लागत बढ़ेगी। माल ढुलाई महंगी होने से रोजमर्रा की वस्तुओं और खाद्य पदार्थों की खुदरा महंगाई में उछाल आएगा। साथ ही, उर्वरक सब्सिडी का सरकारी बजट भी बढ़ जाएगा।
  • फारस की खाड़ी में युद्ध के जोखिम के कारण जहाजों का 'युद्ध जोखिम बीमा प्रीमियम' और कंटेनर मालभाड़ा कई गुना बढ़ गया है, जिससे आयातित कच्चे माल की लागत लगातार ऊंची बनी हुई है। 
रूसी तेल पर भी संकट? 
ईरान संकट के बीच अमेरिका ने रूस से सस्ता तेल खरीदने वाले देशों पर भी शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। अमेरिकी सीनेट ने 86-11 के भारी बहुमत से लिंडसे ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट 2026  पारित कर दिया है।
यदि यह विधेयक अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से पास होकर कानून बनता है, तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूसी तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 फीसदी तक का दंडात्मक टैरिफ  लगाने का कानूनी अधिकार मिल जाएगा।
पश्चिम एशिया में तनाव और चीन की कमजोर मांग के बीच भारत ने जून 2026 में रूस से रिकॉर्ड 25.8 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया। यदि अमेरिकी सेकेंडरी प्रतिबंध या 100 फीसदी टैरिफ का दबाव बढ़ता है, तो भारत के लिए रूस से सस्ता तेल खरीदना कानूनी और वित्तीय रूप से बेहद जटिल हो जाएगा।
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