कभी भारत में पेड़ों पर पककर गिर जाने वाला एवोकाडो कुत्तों के खाने के काम आता था, इसलिए इसे डॉग फ्रूट तक कहा जाता था। अब यही फल तेजी से भारतीय बाजार में लोकप्रिय होकर पसंदीदा फल के रूप में जगह बना रहा है। बढ़ती मांग के बीच किसान इसकी व्यावसायिक खेती की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं रेस्तरां और खाद्य कारोबार भी स्थानीय उत्पादन बढ़ने की उम्मीद कर रहे हैं।
देसी के मुकाबले विदेशी किस्मों की मांग
मुंबई के रेस्तरां भी एवोकाडो की बढ़ती मांग का संकेत दे रहे हैं। हंगर इंक हॉस्पिटैलिटी के कार्यकारी शेफ हुसैन शहजाद के मुताबिक, भारतीय एवोकाडो की गुणवत्ता में सुधार हुआ है, लेकिन मौसम और क्षेत्र के अनुसार आकार, स्वाद, बनावट और पकने की स्थिति में काफी अंतर रहता है। इसलिए फिलहाल उनके रेस्तरां आयातित एवोकाडो को प्राथमिकता देते हैं। भारत में हॅस और पिंकर्टन जैसी विदेशी किस्मों की पौध की मांग भी बढ़ रही है। भोपाल स्थित इंडो-इस्रराइल एवोकाडो नर्सरी के संस्थापक हर्षित गोदहा के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में वह देशभर के किसानों को करीब 18 हजार पौधे दे चुके हैं।
आसान नहीं व्यावसायिक खेती : एवोकाडो की व्यावसायिक खेती आसान नहीं है। बीज से तैयार पेड़ के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल जड़ वाले पौधे पर मनचाही किस्म की शाखा जोड़कर पौध तैयार करनी होती है। पेड़ों की नियमित छंटाई जरूरी है, क्योंकि वे छह-सात साल में करीब 25 फुट तक ऊंचे हो सकते हैं। साथ ही, बेहतर फलन के लिए अलग-अलग किस्मों का सही अनुपात में रोपण और उचित परागण जरूरी है। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बंगलूरू ने स्थानीय पेड़ों के आधार पर दो किस्में विकसित की हैं। अधिक उत्पादन देने वाली और गुणवत्तापूर्ण पौध ही देश में भरोसेमंद एवोकाडो बाजार तैयार कर सकती है।