इंडोनेशियाई पाम ऑयल एसोसिएशन ने चेतावनी दी है कि भीषण अल-नीनो और सूखे के चलते देश के क्रूड पाम तेल (सीपीओ) उत्पादन में 50 लाख टन तक की भारी गिरावट आ सकती है। इसका असर अगले साल की शुरुआत से ही वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर साफ दिखने लगेगा।
भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों का लगभग 55 से 60 फीसदी हिस्सा आयात करता है, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा (सालाना करीब 90-100 लाख टन) पाम तेल का होता है। भारत अपनी पाम तेल की जरूरतें मुख्य रूप से दो ही देशों, इंडोनेशिया और मलेशिया, से पूरी करता है।
पाम तेल दुनिया का सबसे सस्ता खाद्य तेल है और यह बाकी सभी खाद्य तेलों (सोयाबीन, सरसों, सूरजमुखी) के लिए प्राइस एंकर का काम करता है। जब पाम तेल महंगा होता है, तो मांग तुरंत सोयाबीन और घरेलू सरसों तेल की तरफ शिफ्ट होती है। नतीजतन, भारतीय मंडियों में सरसों और रिफाइंड तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं।
सरकार ने कहा है, देश में फिलहाल खाद्य तेल की उपलब्धता को लेकर चिंता की कोई बात नहीं है। बाजार में करीब 14-15 लाख टन खाद्य तेल का स्टॉक उपलब्ध है, जो करीब डेढ़ महीने की घरेलू मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त है। इसके साथ ही सितंबर से सोयाबीन और मूंगफली की नई फसल की आवक शुरू होने की उम्मीद है। इससे घरेलू बाजार में खाद्य तेल की उपलब्धता बढ़ने और आयात पर दबाव कम होने की संभावना है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक नवंबर 2025 से अब तक देश में करीब 120 लाख टन खाद्य तेल का आयात हो चुका है। पिछले साल इसी अवधि में करीब 116 लाख टन खाद्य तेल का आयात हुआ था। इस तरह इस साल अब तक आयात करीब 4 लाख टन अधिक रहा है।
भारत हर साल करीब 160 लाख टन खाद्य तेल का आयात करता है। इसमें करीब 80 लाख टन पाम तेल होता है, जबकि बाकी करीब 80 लाख टन सोयाबीन और सूरजमुखी तेल का आयात किया जाता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव के हिसाब से सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के आयात का अनुपात बदलता रहता है। कई बार दोनों तेलों का आयात करीब 40-40 लाख टन रहता है।