वित्त वर्ष 2025-26 में 265.201 करोड़ रुपये भेजे गए
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घरेलू शेयर बाजार में जारी उतार-चढ़ाव के बीच निवेशक अपने पोर्टफोलियो को विविधता देने (डाइवर्सिफिकेशन) के लिए तेजी से विदेशी बाजारों, विशेषकर अमेरिकी शेयर बाजारों की ओर रुख कर रहे हैं। आरबीआई के नवीनतम लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (एलआरएस) डाटा के अनुसार, चालू वित्त वर्ष 2026-27 के शुरुआती चार महीनों (अप्रैल से जुलाई 2026) में ही भारतीयों ने इक्विटी और डेट निवेश के लिए 1.40 अरब डॉलर विदेश भेजे हैं। यह आंकड़ा वित्त वर्ष 2025-26 में पूरे साल भेजे गए कुल 2.65 अरब डॉलर का लगभग 53 प्रतिशत है।
निवेशकों के पोर्टफोलियो में विविधीकरण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2026 में अब तक निफ्टी 50 में 12% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं, अमेरिकी बाजार एसएंडपी 500, 12% चढ़ा है, जबकि टेक-हैवी नैस्डैक-100 इंडेक्स में 18% की शानदार बढ़त दर्ज की गई है। इस दौरान अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया करीब 5.7% कमजोर हुआ है। अमेरिकी शेयरों में निवेश करने वाले भारतीय निवेशकों को शेयर के भाव बढ़ने के साथ-साथ डॉलर मजबूत होने से रुपये में कनवर्ट करने पर अतिरिक्त रिटर्न (करेंसी गेन) भी मिला है।
एलआरएस के तहत विदेश भेजे गए फंड का रुझान
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अवधि
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भेजा गया फंड
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तुलना/मुख्य बिंदु
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जुलाई 2025
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15.619 करोड़ रुपये
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2024 की समान अवधि के बराबर
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जुलाई 2026
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34.45 करोड़ रुपये
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सालाना 121% की बढ़ोतरी
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अप्रैल 2026
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23.86 करोड़ रुपये
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वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत
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मई 2026
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36.364 करोड़ रुपये
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मासिक वृद्धि का सिलसिला जारी
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जून 2026
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45.669 करोड़ रुपये
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इस साल का अब तक का उच्चतम स्तर
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नए निवेशकों के लिए सलाह
विशेषज्ञों ने नए निवेशकों को आगाह किया है कि सिर्फ रुपये की कमजोरी को देखकर विदेशी बाजार में उतरना सही रणनीति नहीं है। रुपया कमजोर होने पर अमेरिकी शेयर खरीदना महंगा हो जाता है। यदि भविष्य में रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत होता है, तो शेयर के भाव बढ़ने के बावजूद रुपये में मिलने वाला अंतिम रिटर्न कम हो सकता है। नए निवेशकों को करेंसी सट्टेबाजी के बजाय पोर्टफोलियो डाइवर्सिफिकेशन और वैश्विक टेक व बड़ी कंपनियों में हिस्सेदारी हासिल करने के उद्देश्य से ही व्यवस्थित तरीके से विदेश में निवेश करना चाहिए।
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विदेशी बाजारों में निवेश के प्रमुख कारण
वैश्विक अवसरों तक पहुंच: वैश्विक इक्विटी मार्केट कैपिटलाइजेशन में भारत की हिस्सेदारी केवल करीब 4 प्रतिशत है। यानी 96% निवेश अवसर भारत के बाहर मौजूद हैं।
क्षेत्रीय जोखिमों से बचाव: केवल घरेलू बाजार तक सीमित रहने पर निवेशकों को स्थानीय आर्थिक झटकों, टैरिफ और करेंसी के उतार-चढ़ाव का खतरा रहता है।
दोहरा लाभ: अमेरिकी शेयर में निवेश से स्टॉक रिटर्न के साथ-साथ डॉलर के मुकाबले रुपये के अवमूल्यन का भी लाभ मिलता है।