रेपो दर में वृद्धि क्यों आवश्यक थी?
आरबीआई ने बढ़ती खुदरा मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए यह कदम उठाया है। अगस्त में खुदरा मुद्रास्फीति बढ़कर 4.82 फीसदी पर पहुंच गई थी। यह पिछले महीने की 4.45 फीसदी की तुलना में काफी अधिक थी। मुद्रास्फीति पर नियंत्रण रखना केंद्रीय बैंक की प्राथमिकताओं में से एक है। यह उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक संकट भी एक प्रमुख चिंता का विषय रहा है। इस संकट से वैश्विक तेल कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। तेल कीमतों में वृद्धि से घरेलू स्तर पर भी मुद्रास्फीति बढ़ने का खतरा रहता है। इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए दर वृद्धि का निर्णय लिया गया। यह फैसला अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने के लिए महत्वपूर्ण है।
नीतिगत रुख में क्या बदलाव आया है?
मौद्रिक नीति समिति ने अपने नीतिगत रुख में भी बदलाव किया है। एमपीसी ने अपने रुख को 'तटस्थ' से बदलकर 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' कर दिया है। यह बदलाव संकेत देता है कि आरबीआई अब मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए अधिक सक्रिय भूमिका निभाएगा। 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' का अर्थ है कि केंद्रीय बैंक धीरे-धीरे और सोच-समझकर मौद्रिक नीति को सख्त करेगा। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि अर्थव्यवस्था पर अनावश्यक दबाव न पड़े। समिति ने यह भी स्पष्ट किया है कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए निकट भविष्य में दर कटौती की संभावना नहीं है। यह रुख बाजार को स्पष्ट संदेश देता है कि ब्याज दरें अभी ऊंची बनी रहेंगी। यह निर्णय आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
वैश्विक केंद्रीय बैंकों का क्या प्रभाव रहा?
मौद्रिक नीति समिति ने अपने निर्णय लेते समय वैश्विक रुझानों पर भी गौर किया। विकसित देशों के केंद्रीय बैंकों की हालिया कार्रवाइयों को ध्यान में रखा गया। इनमें विशेष रूप से यूएस फेडरल रिजर्व और यूरोपीय सेंट्रल बैंक शामिल हैं। पिछले महीने यूएस फेड ने भी अपनी दर में 25 आधार अंक की वृद्धि की थी। यह वृद्धि बढ़ती तेल कीमतों और अन्य कारकों से उत्पन्न मुद्रास्फीति को रोकने के लिए की गई थी। यूएस फेड से पहले यूरोपीय सेंट्रल बैंक ने भी अपनी प्रमुख ब्याज दर में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी की थी। इन वैश्विक केंद्रीय बैंकों के कदमों ने आरबीआई के निर्णय को प्रभावित किया है। यह वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने का प्रयास है। यह कदम वैश्विक वित्तीय बाजारों में स्थिरता बनाए रखने में भी सहायक होगा।