तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक और रूस सहित अन्य सहयोगी देश उत्पादन में बड़ी कटौती को लेकर बृहस्पतिवार को मंथन करेंगे। वैश्विक बाजार में क्रूड की गिरती कीमतों को थामने के लिए उत्पादक देश बड़ी कटौती का फैसला कर सकते हैं। इस कदम से क्रूड की कीमतों में इजाफा होगा, जिसका असर भारत के घरेलू तेल बाजार में भी दिखेगा।
इराक के तेल मंत्री थामेर घधबान ने बुधवार को बताया कि सभी तेल उत्पादक देशों की मंत्रिस्तरीय बैठक में इस पर फैसला किया जाएगा कि मौजूदा हालात में उत्पादन कितना घटाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जून में हुई बैठक में ही इस बात पर सहमति बनी थी कि जनवरी से छह महीने के लिए लागू की गई कटौती पर्याप्त नहीं होगी और हमें इसका दायरा दो महीने और बढ़ाना चाहिए। लिहाजा बृहस्पतिवार को होने वाली बैठक में इस बात पर मंथन किया जाएगा कि मौजूदा 12 लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती को ही जारी रखा जाए या इससे भी बड़ी कटौती किए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पिछले साल नवंबर में 16 लाख बैरल प्रतिदिन और 18 लाख बैरल प्रति दिन कटौती का विकल्प रखा गया था, लेकिन कुछ उत्पादक देशों की असहमति के कारण 12 लाख बैरल ही कटौती की गई।
मांग में नरमी से गिरीं कीमतें
ग्लोबल ऑयल ट्रेडिंग कंपनी ट्राफिग्यूरा बीहेर के प्रमुख (वैश्विक व्यापार) बेन ल्यूकॉक का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमतों में लगातार गिरावट आई है। पिछले साल यह 85 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को भी पार गया था, जो अभी 60 से 65 डॉलर प्रति बैरल के बीच चल रहा है। उन्होंने कहा कि ओपेक व सहयोगी देश तेल कीमतों को 70 से 75 डॉलर प्रति बैरल पर रखना चाहते हैं, जो उपभोक्ताओं के लिए बहुत ज्यादा नहीं होगा और उत्पादक देशों को भी मुनाफा मिलता रहेगा। हालांकि, लगातार मांग में नरमी से कीमतें ऊपर नहीं जा रहीं।
अगले दो साल और घटेगी खपत
ओपेक की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2019 और 2020 में तेल की वैश्विक मांग की वृद्धि दर और नीचे जाएगी। उसका कहना है कि अगले दो साल तक वैश्विक मांग में 10 लाख बैरल प्रतिदिन से ज्यादा की कमी आएगी। इससे पहले अगस्त मेें 80 हजार बैरल प्रतिदिन की मांग घटने का अनुमान लगाया था। तेल उत्पादक देशों का कहना है कि अमेरिका और चीन में जारी व्यापार युद्ध के कारण इस साल पहली बार तेल की मांग 1 फीसदी घट गई है। इससे आने वाले छह महीने में कीमतें 50 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं।
भारत पर सबसे ज्यादा असर
क्रूड की कीमतों में उछाल आने का सबसे ज्यादा असर भारत पर दिखता है, जहां कुल खपत का 84 फीसदी तेल आयात करना पड़ता है। जानकारों का मानना है कि भारत के आयात बिल का बोझ तेल वितरण कंपनियां घरेलू उपभोक्ताओं पर डालेंगी, जिसका असर आपकी जेब पर होगा। 2018-19 में भारत ने कुल ऊर्जा जरूरतों का करीब 20 फीसदी तेल इराक से खरीदा है, जो पहली बार सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है। अभी तक इस मामले में पहले पायदान पर रहने वाला सऊदी अरब इस बार दूसरे स्थान पर रहा।
कंपनियां रोज नहीं बदल रहीं दाम
घरेलू बाजार में तेल विपणन कंपनियां पिछले कुछ महीने से कीमतों में रोजाना बदलाव नहीं कर रही हैं। जून से लेकर अगस्त तक की तीन महीने की अवधि में पेट्रोल की कीमत में 43 दिन और डीजल की कीमत में 47 दिनों तक कोई बदलाव नहीं किया। जून से अगस्त की अवधि में डीजल की कीमत में लगातार 13 दिन तक कोई बदलाव नहीं हुआ, जबकि पेट्रोल की कीमत में लगातार आठ दिनों तक बदलाव नहीं किया गया।