वित्त मंत्री अरुण जेटली अपना तीसरा बजट पेश करेंगे। उनके सामने कृषि क्षेत्र और उद्योग जगत की जरूरतों को संतुलित करने की बड़ी चुनौती होगी। इसके अलावा, वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती के बीच सार्वजनिक खर्च में बढ़ोतरी के लिए संसाधन जुटाने पर उनका ध्यान होगा। माना जा रहा है कि आयकर के मोर्च पर यह बजट पूर्ववत रहेगा।
टैक्स स्लैब में शायद ही कोई बदलाव किए जाएं लेकिन कर छूट की सीमा में कुछ बदलाव किए जा सकते हैं। देश में लगातार सूखे की स्थिति के कारण गांवों की बढ़ती पीड़ा के मद्देनजर वित्त मंत्री पर ग्रामीण योजनाओं पर ज्यादा खर्च करने का दबाव भी है।
इसके साथ ही उन्हें विदेशी निवेशकों का दिल भी जीतना होगा जो शीघ्र सुधार चाह रहे हैं। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन से सरकार पर 1.02 लाख करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। इस वजह से भी वित्त मंत्री की कठिनाइयां बढ़ी हैं। अगले साल के लिए राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को जीडीपी के 3.5 प्रतिशत पर रखने के पूर्व में घोषित लक्ष्य से समझौता किए बिना वे इसे कैसे करते हैं यह देखने वाली बात होगी।