इलेक्ट्रिक वाहनों (ई-वाहन) को सस्ती लीथियम आयन बैटरी मुहैया कराने के लिए सरकार ने घरेलू स्तर पर ही भारी मात्रा में बैटरी बनाने का फैसला किया है। इसके लिए सरकार जल्द ही ‘बैटरी नीति’ की घोषणा करने वाली है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने अमर उजाला के साथ बातचीत में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि दुनियाभर के बैटरी निर्माता भारत में कारखाना लगाना चाहते हैं। इस नीति से वे यहां कारखाना लगाने के लिए प्रोत्साहित होंगे।
सरकार का मानना है कि ई-वाहन को लोकप्रिया बनाने की राह में बैटरी की कीमत सबसे बड़ा रोड़ा है। वर्तमान में मोटर वाहन की कीमत में करीब 50 फीसदी हिस्सा बैटरी की लागत है। यदि बैटरी की कीमत इतनी ज्यादा होगी तो इसे हमेशा सब्सिडी देनी पड़ेगी। ऐसे में ई-वाहनों का लोकप्रिय होना मुश्किल है। इस समय ई-वाहनों में इस्तेमाल होने वाली लीथियम आयन बैटरी की शत प्रतिशत आयात करना पड़ता है। राजीव कुमार का मानना है कि ‘बैटरी नीति’ बनने के बाद इस क्षेत्र का अपने-आप विकास हो जाएगा। लीथियम आयन बैटरी के आयात से भी राहत मिलेगी।
अभी काफी महंगी है बैटरी
ई-वाहनों में इस्तेमाल होने वाली लीथियम आयन बैटरी काफी महंगी है। इस समय इसकी प्रति किलोवाट कीमत 273 डॉलर (करीब 19,351 रुपये) है, जो काफी अधिक है। इस क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक इसकी कीमत घटकर 70 डॉलर (करीब 4,961 रुपये) के आसपास नहीं आ जाती, तब तक ई-वाहनों को लोकप्रिय नहीं बनाया जा सकता है।
इसके मद्देनजर सरकार अपने स्तर पर प्रयास कर इसकी कीमतें घटाने का प्रयास कर रही है। इस दिशा में ऑटोमोबाइल क्षेत्र की कंपनियां भी आगे आ रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि लीथियन आयन बैटरी की कीमतें घटने से ई-वाहन के दाम भी कम होंगे।
ऊर्जा के एक स्रोत पर निर्भर नहीं रहें
प्रख्यात वैज्ञानिक एवं सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग के सदस्य डॉ. वीके सारस्वत का मानना है कि देश की ऊर्जा आवश्यकता को पूरा करने के लिए किसी एक स्रोत पर निर्भर नहीं रहना चाहिए बल्कि मिश्रित स्रोत को अपनाना चाहिए। उनका कहना है कि ऊर्जा के लिए हर उस स्रोत पर विचार करना होगा, जो देश के लिए सस्ता हो। साथ ही उससे कार्बन उत्सर्जन घटे और पर्यावरण पर भी उसका कम-से-कम असर हो। लेकिन, यदि दिल्ली में ई-वाहन चलाने के लिए कहीं प्रदूषण फैलाकर बिजली बनानी पड़े तो ऐसी स्थिति से बचना चाहिए। यह भविष्य के लिए भी हानिकारक होगी।
अभी भी 58 फीसदी बिजली कोयले से
सारस्वत का कहना है कि आज हमारी करीब 58 फीसदी बिजली की आपूर्ति का स्रोत कोयला है। 28 फीसदी बिजली तेल से, सात फीसदी गैस से, चार फीसदी पनबिजली से, दो फीसदी परमाणु से और करीब दो फीसदी अक्षय ऊर्जा के स्रोतों से बनती है। इनमें से किसी एक पर निर्भर रहना ठीक नहीं है। यह जरूर है कि अगले कुछ वर्षों में जीवाष्म ईंधन की हिस्सेदारी घटानी होगी और और स्वच्छ ईंधन का प्रतिशत बढ़ाना होगा। साथ ही यह भी देखना होगा कि स्वच्छ ईंधन से बनने वाली बिजली हमें किस भाव पर पड़ रही है।
उदाहरण के लिए, प्राकृतिक गैस तो स्वच्छ ईंधन है लेकिन यदि इसका आयात किया जाए तो यह महंगा पड़ता है। भारत में प्राकृतिक गैस की भीषण कमी है और इस समय कुल उपयोग का 80 फीसदी हिस्सा आयात करना पड़ा है। इसलिए हमें वैसे स्रोत पर बल देना होगा, जो यहीं उपलब्ध हो और उससे ज्यादा प्रदूषण भी न फैले।