निदेशालय ने तीन तरह की जानकारी मांगी है। पहली, बैंकों को दी जाने वाली सर्विस का प्रकार। दूसरा, इन सर्विस के अदा किया गया सर्विस टैक्स। तीसरा, कांट्रैक्ट की कॉपी और 2013-14 से लेकर के 2016-17 के बीच की सभी वार्षिक रिपोर्ट। यह जानकारी सभी बैंकों और कंपनियों से मांगी गई है।
शुरू हुआ आरोप-प्रत्यारोप का दौर
निदेशालय से नोटिस मिलने के बाद बैंक और कंपनियों ने एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना शुरू कर दिया है। कंपनियां और बैंक इस मामले अपना-अपना पल्ला झाड़ रही हैं और एक-दूसरे को गलती के लिए दोषी मान रही हैं।
टैक्स अधिकारियों का कहना है कि बैंकों ने ज्यादातर मामलों में सर्विस टैक्स अदा किया और क्रेडिट भी ले लिया। जबकि कुछ सेवाओं के लिए सर्विस टैक्स लागू नहीं था और उन्हें केवल वैट ही देना था। जबकि कुछ सेवाओं पर आंशिक तौर पर वैट देना था।
कांट्रैक्ट देने में हुआ है फ्रॉड
अधिकारियों का मानना है कि बैंकों ने कई सारे ऐसे कांट्रैक्ट किए हैं, जिनमें घोटाला होने का संदेह है। अब अधिकारी इस बात की जांच मे लगे हैं, कि क्या सही एटीएम मशीन किराये पर लगाने को लेकर के धांधली हुई है या नहीं।