6 महीने पहले ही भारतीय कंपनियां और नीतिकार गिरती रुपये के गिरते स्तर से जूझ रहे था। मगर, रुपये का मजबूत वापसी ने भी उनके लिए दिक्कते खड़ी कर रखीं हैं। रुपये की 5.6 फीसदी की मजबूती ने महंगाई पर कुछ हद तक लगाम तो लगाई है, मगर इससे भारतीय निर्यातकों का मुनाफा घट रहा है। जहां एक तरफ भारतीय आईटी सेक्टर और दवा कंपनियों पर अमेरिका H1-B वीजा के जरिए शिकंजा बनाने में लगा है, वही रुपये की मजबूती ने उनकी सिरदर्दी बढ़ा दी है।
देश की सबसे ब़ड़ी आईटी कंपनी टीसीएस के सीईओ राजेश गोपीनाथन भी रुपये की मजबूती से चिंतित है। टाटा, इंफोसिस और विप्रो जैसी बड़ी आईटी कंपनियों की 90 फीसदी कमाई और सनफार्मासुटिकल्स और लुपिन जैसी दवा कंपनियों का 70 फीसदी हिस्सा विदेश से आता है। रुपये में लगातार सुधार इन कंपनियों के लिए चिंता का सबब बना हुआ है।
2016 में रुपये में सुधार के लिए सरकार ने हाई यील्ड बॉन्ड जारी किए थे। इसके बाद बाद से ही यह विदेशों निवेशकों को आकर्षित कर रहा है। रुपये में सुधार मोदी सरकार का प्रमुख एजेंडा था। इसके बाद से ही विदेशी निवेशकों ने भारतीय बॉन्ड्स में 15 बिलियन डॉलर का निवेश किया है। हालांकि, तेजी से हो रहे इस सुधार से भारत की एक्सचेंज रेट पर खासा असर पड़ा है।