नकली उत्पादों की खरीद-फरोख्त से बीते साल अर्थव्यवस्था को 1 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। 2019 में जालसाजी या नकली उत्पाद बनाने-बेचने की घटनाओं में भी 24 फीसदी इजाफा हुआ। जालसाजीरोधी संस्था एएसपीए ने गुरुवार को एक रिपोर्ट में बताया कि महामारी में नियमित और संगठित आपूर्ति सेवाओं पर असर की वजह से नकली उत्पादों को पांव पसारने का ज्यादा मौका मिला है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस साल फरवरी से अप्रैल तक नकली उत्पाद बनाने-बेचने के 150 मामले सामने आए जिसमें अधिकतर जाली पीपीई किट, सैनिटाइजर्स और मास्क से जुड़े थे। महामारी की वजह से इन उत्पादों की मांग अचानक बहुत बढ़ गई थी और संगठित आपूर्ति शृंखला इसकी भरपाई नहीं कर पा रही थी।
प्रमाणीकरण समाधान प्रदाता संगठन (एएसपीए) के अध्यक्ष नकुल पश्रिचा ने बताया कि अगर 2018 से तुलना करें तो 2019 में जालसाजी के मामले 24 फीसदी बढ़ गए और कुल 1 लाख करोड़ रुपये की चपत सरकारी राजस्व को लगाई।
दुनिया का 3.3% व्यापार नकली
आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) के अनुसार, दुनिया में नकली उत्पादों का कारोबार कुल व्यापार का 3.3 फीसदी है। सबसे ज्यादा प्रभावित 10 क्षेत्रों में मुद्रा, एफएमसीजी, शराब, फार्मा, दस्तावेज, कृषि, इन्फ्रा, ऑटोमोटिव, तंबाकू, लाइफस्टाइल और कपड़ा है। इसमेें भी मुद्रा, शराब और खाने-पीने की चीजें टॉप-3 में हैं। 2019 में एफएमसीजी क्षेत्र में नकली उत्पादों के मामले 63 फीसदी बढ़े।
यूपी-बिहार नकली उत्पादों का गढ़
नकली उत्पादों की सबसे ज्यादा बिक्री उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बंगाल, पंजाब, झारखंड, दिल्ली, गुजरात और उत्तराखंड में होती है। इसमें यूपी शीर्ष पर है जिसके बाद बिहार और राजस्थान का नंबर आता है।
पिछले दो वर्षों में नकली उत्पादों की की बिक्री या निर्माण की कुल घटनाओं में 45 फीसदी इन तीन राज्यों से जुड़ी रहीं। रिपोर्ट बताती है कि नकली उत्पादों ने सिर्फ लग्जरी श्रेणी में ही सेंध नहीं मारी है, बल्कि रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों के बीच भी गहरी पैठ बना ली है। जीरा, सरसों तेल, घी, हेयर ऑयल, साबुन, दवाओं आदि के नकली उत्पाद धड़ल्ले से बिक रहे हैं।