झीलों की नगरी और विश्वभर में पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र उदयपुर में कांग्रेस की दिग्गज महिला नेता गिरिजा व्यास और वसुंधरा सरकार में मंत्री गुलाबचंद कटारिया में से किसका सियासी सूरज उदय होगा और किसका अस्त?
योगी, कांग्रेस के काम आ गए?
गिरिजा के पास निजी लोकप्रियता है तो कटारिया के पास धन, बल और सत्ता की ताकत। गिरिजा को भरोसा है कि भाजपा में कटारिया के खिलाफ बगावत उनकी जीत का रास्ता साफ कर रही है तो कटारिया को भरोसा है कि आखिरी वक्त में वह हवा का रुख अपने पक्ष में मोड़ लेंगे। लेकिन कटारिया की मदद करने आए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भाषणों ने उन मुसलामानों को नाराज कर दिया है जो कटारिया का समर्थन करते रहे हैं। योगी का भाषण कटारिया के लिए मुसीबत और गिरिजा व्यास के लिए ताकत बनता दिख रहा है।
गुलाबचंद कटारिया उदयपुर शहर से विधायक और सूबे के गृहमंत्री हैं। उनकी गिनती वसुंधरा सरकार के ताकतवर मंत्रियों में होती है। मगर सरकार और पार्टी में कटारिया को वसुंधरा का धुर विरोधी भी माना जाता है। इसलिए यह चर्चा भी आम है कि पार्टी से बगावत करके चुनाव लड़ रहे दलपत सुराणा को पर्दे के पीछे से वसुंधरा राजे का समर्थन हासिल है, इसलिए स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं की एक बड़ी जमात सुराणा की मदद कर रही है और करीब 45 साल से पार्टी को समर्पित रहे सुराणा आखिरी वक्त तक नामांकन वापस लेने को तैयार नहीं थे।
इस सब के बावजूद लोग अब भी यह बताने की स्थिति में नहीं हैं कि उदयपुर में सियासत का ऊंट किस करवट बैठेगा।
किसकी होगी जीत?
शहर के मशहूर बाजार हाथीपोल में साड़ियों की दुकान में काम करने वाले आरिफ कहते हैं कि कोई भी जीत सकता है। मगर दुकान के बगल में एंटीक सामान बेचने वाले रमेश का कहना है कि भाजपा का पलड़ा भारी है और कटारिया को हरा पाना मुश्किल है। कुछ आगे चलने पर वकील नरेश बंसल मिले, उनकी राय जुदा है। नरेश का कहना है कि उदयपुर के लिए कटारिया ने कुछ भी नहीं किया इसलिए इस बार यहां से कांग्रेस की जीत होगी।
हाथीपोल बाजार में कई मुसलमानों की दुकानें हैं। यह लोग बताते हैं कि शहर में अमन और भाईचारा सदियों से है इसलिए भाजपा और कांग्रेस में कोई फर्क नहीं हुआ। कई चुनावों से मुसलमानों की बड़ी तादाद भाजपा के लिए करती आई है। नगर निगम और दूसरे सरकारी कामों में कटारिया मुस्लिम ठेकेदारों की मदद करते रहे हैं, इसलिए मुसलामानों की एक बड़ी तादाद भई कटारिया के साथ खड़ी है। लेकिन योगी आदित्यनाथ के हिंदूवादी भाषणों ने उन्हें नाराज कर दिया है।
मोहम्मद अयूब कहते हैं कि हमारे लिए भाजपा और कांग्रेस में फर्क नहीं रहा मगर योगीजी ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है। कटारिया इन रूठे हुए मुसलमानों को मनाने में लगे हैं जबकि कांग्रेस इन्हें छिटकाने में। उदयपुर में कांग्रेस के स्थानीय नेता डॉ. अनुज शर्मा कहते हैं कि गिरिजा जी तो पहले भी जीत रही थीं। योगी जी आए और उनकी और मदद कर गए हैं।
उदयपुर में जातियों की सभाएं हो रही हैं। मैदान में सुराणा के ताकतवर होने से जैन समाज भी बंट गया है। जबकि भाजपा के प्रति झुकाव रखने वाला ब्राह्मण समाज गिरिजा व्यास के मैदान में होने से आज असमंजस में है। आनंदपाल हत्याकांड, जसवंत सिंह की अनदेखी और मानवेंद्र सिंह के कांग्रेस में शामिल होने से भाजपा का ठोस जनाधार रहे राजपूतों में भी विभाजन है।
मुद्दों की बात करें तो उदयपुर भी शेष राजस्थान से अलग नहीं है। कई लोग बदलाव की बात करते हैं, कुछ कांटे की टक्कर बताते हैं तो कुछ ऐसे भी मिल जाते हैं जो कहते हैं कि भाजपा की हालत सुधर रही है। लेकिन सबका यह मानना है कि 2013 जैसी भाजपा की आंधी नहीं है। वैसे गिरिजा व्यास और कटारिया का यह पहला मुकाबला नहीं है। गिरिजा व्यास पहले भी गुलाबचंद कटारिया को मात दे चुकी हैं।